भदोही। लॉकडाउन के बाद से सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, गाजियाबाद से प्रवासियों के लौटने का सिलसिला जारी है। लौट रहे मजदूर अपने साथ मार्मिक कहानी लेकर आ रहे हैं। प्रवासियों का कहना है कि इतनी परेशानी झेलने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह है कि आगे का रोजगार कैसे चलेगा। चौरी के उमाशंकर सरोज चार अन्य परिजनों के साथ निजी बस से प्रति व्यक्ति 3 हजार रुपये खर्च कर लौटे हैं। उन्होंने कहा कि मुंबई वापस लौटेंगे या नहीं यह लॉकडाउन और कोरोना तय करेगा। लोकल में रोजगार नहीं मिलने पर वापस लौटना पड़ेगा। फिलहाल नया रोजगार व्यवस्थित करने की चुनौती है।
उमाशंकर ने बताया कि वे मुंबई के भोइसर में लूम पर काम करते थे। वैसे तो उनके पास काम हमेशा रहता था, जिससे वे 15 हजार रुपये बना लेते थे। लेकिन 25 मार्च से शुरू लॉकडाउन के बाद से बैठ कर पूंजी ही खाई है। कहा जब तक पूंजी थी तब तक वापस लौटने की जल्दी नहीं थी लेकिन पूंजी खत्म होते ही वहां से भागना पड़ा। बताया हम लोग चार लोग थे। प्रति व्यक्ति 3 हजार रुपये देकर किसी तरह गोपीगंज तक पहुंचे वहां से आटो रिक्शा से भदोही पहुंचे। अब वापस मुंबई लौटेंगे या नहीं यह लॉकडाउन और कोरोना तय करेगा। यदि घर वालों ने इजाजत दिया तो लौटने के बारे में सोचेंगे। क्योंकि यहां रोजगार मिलना नहीं है।
मूंसीलाटपुर के रतिलाल गौतम सूरत में पल्लेदारी करते हैं। किसी महीने में 8 हजार तो किसी महीने में 10 हजार बना लेते थे। चूंकि वहां अकेले थे इसलिए यह रकम ठीक था। परिवार को भदोही में रहता है। बताया कि लॉकडाउन के दिन से घर को तो कुछ भेज नहीं सके और जमा पूंजी खाते रहे। घर पर पिता जी के पास भी कोई काम नहीं है। ऐसे में घर कुछ कमा कर ले तो नहीं आ सके लेकिन परिवार पर बोझ बनने के लिए आ गए। निजी बस को 3 हजार रुपये देकर घर के लिए चले थे। रास्ते में केवल उप्र में दिक्कत हुई। रति लाल ने कहा कि सरकार पैकेज की घोषणा कर रही है। ऐसे पैकेजों में हम जैसों के लिए क्या है मैं भी नहीं समझ सका हूं। भगवान से प्रार्थना है कि आगे से किसी को रोजगार के लिए अपना घर छोड़ने की नौबत न आए।