भदोही में निर्मित ऊनी कालीन। स्रोत- संवाद
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भदोही। खाड़ी देशों में युद्ध के माहौल से कालीन उत्पादन में एक साथ कई समस्या खड़ी हो गई है। पहले से ही ट्रंप के टैरिफ से अब तक उबरने की जद्दोजहद कर रहे कालीन उद्यमियों के सामने ऊनी यार्न की बढ़ती कीमतों ने निर्यातकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। एक ओर उत्पादक परेशान हैं, तो दूसरी ओर यार्न व्यावसायी भी त्रस्त हैं। इस समय यार्न (काती) की कीमतों में करीब 15 से 20 फीसदी का उछाल देखा जा रहा है। भारतीय कालीनों में अधिकतर ऊलेन यार्न आयातित होता है। जिसमें प्रमुख रूप से चीन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और रूस से सर्वाधिक ऊनी धागा आयात होता है। इसके अलावा सीरिया, सऊदी अरब और मंगोलिया, इंडोनेशिया, टर्की, मिस्र, समेत मिडिल ईस्ट के अन्य देशों से भी भारत ऊनी धागे का आयात करता है।
उसी समय अमेरिकी इस्राइल सेनाओं द्वारा ईरान के साथ युद्ध में कूद जाने से ऊन का आयात बाधित हो गया। जिससे विदेशों से भारत आ रहे ऊन के ट्रांसपोर्टेशन में दिक्कतें शुरू हो गई। युद्ध का असर रहा कि शिपिंग एजेंटों ने 20 फीसदी तक ट्रांसपोर्टेशन खर्चों में बढ़ोतरी कर दी। यह बोझ भी निर्यातकों पर ही पड़ रहा है। भारतीय काती सप्लायर्स ऊनी धागे का चीन कनेक्शन भी गिना रहे हैं। निर्यातकों का यह भी कहना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में अस्थिरता का माहौल बना रहेगा, तब तक कीमतें नीचे नहीं आएगी।