विज्ञान की कक्षाओं में छात्र-छात्राओं को पढ़ाया जाता है, लेकिन प्रैक्टिकल करने का मौका उन्हें मिलना मुश्किल हो जाता है। चुनिंदा स्कूलों को छोड़कर ज्यादातर स्कूलों की प्रयोगशालाओं में उपकरण ही नहीं है, इससे सरकार के बाल विज्ञानी बनाने के सपने बेदम होता नजर आ रहा है।
जिले में दो राजकीय, 25 वित्तपोषित समेत 165 इंटर और हाईस्कूल हैं। राजकीय और वित्तपोषित स्कूलों में प्रयोशालाओं की स्थिति वित्तविहीन स्कूलों से ठीक है, लेकिन कुछ ही स्कूलों में छात्र-छात्राओं को प्रेक्टिकल की सभी सुविधाएं मिल रही हैं।
करीब 130 वित्तविहीन स्कूलों में प्रयोगशाला के नाम पर सिर्फ एक कक्ष बनकर खड़ा है। उपकरण के नाम पर एकाध सामान ही कक्षों में दिखाई पड़ते हैं।
इससे विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र-छात्राओं को कक्षाओं में पढ़ाई जाने वाली जानकारी के अलावा प्रैक्टिकल करने का मौका नहीं मिल पाता।
माध्यमिक शिक्षा विभाग के आंकड़ो पर नजर डाली जाए तो 165 स्कूलों में करीब 140 स्कूलों में विज्ञान की शिक्षा दी जाती है हालांकि ज्यादातर स्कूलों में अवैज्ञानिक ढंग से विज्ञान की शिक्षा दी जा रही है।
ऐसे स्कूलों में विज्ञान के शिक्षकों की भी कमोबेश यही स्थिति है। राम भरोसे ही विज्ञान की पढ़ाई विद्यालयों में चल रही है। जिला विद्यालय निरीक्षक संतोष कुमार मिश्र ने कहा कि प्रयोगशाला के बिना स्कूल को मान्यता ही नहीं दी जाती लेकिन उपकरणों को लेकर सही जानकारी नहीं है। परीक्षा के बाद स्कूलों की प्रयोगशलाओं की जांच की जाएगी।