दुनियाभर में अपनी कारीगरी के लिए चर्चित भदोही के कालीन उद्योग की स्याह हकीकत को पूरी तरह बेनकाब होना अभी बाकी है। पिछले दिनों चौरी क्षेत्र के वेदमनपुर गांव में एक कालीन कारखाने में बाल मजदूरी का खुलासा तो महज बानगी भर है, बंधुआ मजदूरी और पर्यावरण क्षरण जैसे तमाम दोष इस कारोबार की चमक को फीका कर रहे हैं। यही वजह है कि कभी पौ फटते ही जिले के कालीन कारखानों से निकलने वाली खटर-पटर की आवाज अब उड़ीसा, जयपुर, शाहजहांपुर, बिहार और बंगाल की पहचान बनने लगी है। इसके पीछे मुख्य वजह बुनकरों का शोषण मानी जा रही है।
महंगाई के अनुपात में नहीं बढ़ी मजदूरी
जिन बुनकरों की हाथ की कारीगरी के बूते लखपति करोड़पति बन गए और करोड़पति अरबपति, उनकी दशा में 10 साल बाद भी कोई सुधार नहीं आया। देश के कालीन निर्यात में हर वर्ष लगभग चार हजार करोड़ की भागीदारी निभाने वाले भदोही जिले में बुनकरों की माली हालत बेहद खराब है। कारोबार को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले हुनरमंद हाथों को अब भी 100 से 200 रुपये के बीच ही दिहाड़ी में गुजारा करना पड़ता है। आर्थिक तंगी के बीच लंबे समय समय तक काम करते रहने का नतीजा है कि बड़ी संख्या में बुनकरों ने इस काम से किनारा कर लिया। यही वजह है कि जिले में उच्च गुणवत्ता वाली हैंडमेड कालीनों के निर्माण में तेजी से कमी आ रही है। दूसरी ओर मशीनमेड कालीनों ने जिले की पहचान हैंडमेड कालीन का गला घोंटना शुरू कर दिया है। जानकारों का कहना है कि इस समस्या को लेकर समय रहते चेता नहीं गया तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
मामूली रकम से खर्च चलाना मुश्किल
चौरी। मौजूदा महंगाई के दौर में मजदूरों ने कम मजदूरी की बात स्वीकारी। 30 साल से कालीन बुनकरी के काम में लगे वेदमनपुर गांव निवासी फिरोज अहमद कहते हैं कि दस साल पहले मैं बुनकरी कर आठ घंटे में 60-70 रुपये कमा लेता था। अब डेढ़ से दो सौ रुपये कमा पाता हूं, लेकिन 15 साल पहले की तुलना में अब इस रकम में पांच बच्चों का परिवार चला पाना मुश्किल हो गया है। मोमिनपुर के सिराज अहमद कहते हैं कि मैं 20 साल से कालीन बुनकरी का काम कर रहा हूं। जिस रफ्तार से महंगाई बढ़ी, उस हिसाब से बुनाई के रेट नहीं बढ़े। सरकार की तरफ से भी बुनकरों के लिए कोई सुविधा नहीं बढ़ाई गई। कोल्हड़ निवासी मकोई लाल का कहना है कि मैं बुनाई का काम करता था, लेकिन देखा कि इससे परिवार नहीं चल पा रहा है तो मनरेगा का जॉबकार्ड बनवा लिया। अब खाली समय में बुनाई करता हूं। तब परिवार की आजीविका चल पा रही है। बरदहां निवासी बुनकर लालचंद्र के छह बच्चे हैं। वह घर पर कालीन बुनाई का काम करते हैं। लेकिन बच्चों ने कालीन बुनाई से ज्यादा खेत में मजदूरी करने के पेशे को महत्व दिया। उनका कहना है कि बच्चे साफ कहते हैं कि मेहनत के हिसाब से इस पेशे में पैसा नहीं है।
अगर कोई बुनकर 100 से 200 रुपये कालीन बुनाई मिलने की बात कह रहा है तो वह झूठ बोल रहा है। क्योंकि अच्छी कालीन बुनकरी का हुनर रखने वाले बुनकरों को इससे ज्यादा पारिश्रमिक मिलता है। उस पर भी हुनरमंद बुनकर नहीं मिल रहे हैं। जिस कालीन बुनकरी को अच्छा माना जाता है, उसके कारीगर अब बहुत कम हैं।
विनय कपूर, अध्यक्ष एकमा