ज्ञानपुर। लॉकडाउन में प्रवासियों और गंगा तटवर्ती किसानों की माली हालत सुधारने के लिए औषधीय खेती की मुहिम जिले में धड़ाम हो गई। 100 हेक्टेयर लक्ष्य के सापेक्ष मात्र सात हेक्टेयर में ही खेती हो सकी। लक्ष्य को पूर्ण करना वन विभाग के लिए मुश्किल दिख रहा है।
लॉकडाउन में रोजगार सृजन के लिए वन विभाग की ओर से नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के तटवर्ती गावों में औषधीय खेती की मुहिम शुरू की गई थी। मई में इसके लिए औराई और डीघ ब्लॉक के 15 से 20 गावों का सर्वे भी किया गया। जिसमें 100 हेक्टेयर में औषधीय खेती का लक्ष्य तय हुआ, लेकिन विभाग की तैयारी परवान नहीं चढ़ सकी। विभाग की ओर से 15 प्रकार के औषधीय पौधे लगाए जाने थे लेकिन खस, लेमनग्रास और तुलसी की खेती हो सकी है। विभाग का मानना है कि खेती के लिए थानीपुर और खमरिया में नर्सरी लगाकर लेमन ग्रास, पामारोजा, तुलसी, पीली सतावर, सर्पगंधा, वच, कालमेघ को रखा गया था। डीएफओ आलोक सक्सेना ने बताया कि तटवर्ती क्षेत्र डीघ में मिट्टी का कटाव, बहाव रोकने में औषधीय खेती लाभपरक है। यह किसानों को रोजगार उपलब्ध कराकर आर्थिक स्थिति को मजबूती देने में सहायक है। मिट्टी कैसी भी हो औषधीय पौधों से उपजाऊ बन जाती है। औषधि के 640 प्रजातियों में 36 महत्वपूर्ण हैं। इनमें 15 प्रकार के पौधों की विशेष मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े पैमाने पर है। लेमन ग्रास, पामारोजा, तुलसी, पीली सतावर, सर्पगंधा, वच, कालमेघ औषधीय खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली है। तरह-तरह के रोगों में इसका प्रभाव काफी कामगर है, लेकिन किसानों का सहयोग न मिलने से मात्र चार गांव मरसड़ा, सदाशिवपट्टी, कलिंजरा और भमौरी में ही सात हेक्टेयर में खेती हो सकी।
इन गावों में होनी थी खेती
ज्ञानपुर। डीएफओ एके सक्सेना ने कहा कि डीघ के छेछुआं, तुलसीकला, भमौरी-शेरपुर, इनारगांव, अरता, रामदासपुर, शिवनाथपट्टी, जगापुर, सदाशिवपट्टी, गिराई, कौलापुर, बिहरोजपुर, नारेपार, बारीपुर, फुलवरिया, बनकट, गोपालापुर, त्रिभुवनपुर, कलिंजरा, गोलखरा में करीब 100 हेक्टेयर औषधीय खेती का लक्ष्य तैयार किया गया था, लेकिन किसानों का सहयोग न मिलने से अभियान शत प्रतिशत सफल नहीं हो सका।