विदेशों में लोकप्रिय भारतीय कालीन अपनी रंगामेजी से खूबसूरत बन जाते हैं। उद्योग में लगे सैकड़ों रंगसाज काती में तरह तरह से रंग डालने के लिए नित नए प्रयोग करते हैं, लेकिन इन दिनों उद्योग की खस्ताहाली से उनसे जुड़े सैक़ड़ों मजदूरों को भी दिक्कतें उठानी पड़ रही है। रंगसाजों का कहना है कि दो दशक में जरूरी चीजों के दाम में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, लेकिन उनकी
नगर के प्रमुख रंगसाज इस्तियाक डायर ने कहा कि कालीन यदि आकर्षक दिखते हैं तो उसमे काती (ऊनी धागे) की रंगाई का बड़ा हाथ है। देखा जा रहा है कि रंगाई में विविधता की मांग बढ़ती जा रही है, लेकिन मजदूरी 20 वर्ष पूर्व वाली भी नहीं रह गई है। कहा कि पहले हम परंपरागत कालीनों की सालिड रंगाई करते थे लेकिन आज उसका स्थान गाबा, डीप डाईंग, अबरश व स्पेस डाईंग ने ले ली है। जिसमें मेहनत तो लगती ही है समय भी अधिक लगता है।
बताया कि हम लोग परंपरागत सालिड की रंगाई जहां दिन भर में हम 500 किलो काती रंग लेते थे वही आज की सबसे अधिक मांग वाली स्पेस डाइंग में तीन गुना धन और समय लगता है लेकिन कीमत दोगुना भी नहीं मिलती। खास बात यह है कि आयातक आजकल स्पेस डाइंग की मांग कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम आयकर के अलावा सेल्स टैक्स, वैट आदि भी भरते हैं इसके बाद भी प्रोत्साहन के नाम पर कुछ नहीं मिलता। सवाल किया कि जब अच्छे निर्यातकों को सम्मानित किए जाने की परंपरा है तो अच्छे रंगसाजों को भी सम्मान देकर उनका उत्साहवर्धन करने से काम और बेहतर हो सकता है। उन्होंने भदोही विधायक के मार्फत मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव को पत्र भेज कर रंगसाजों के लिए प्रोत्साहन योजना शुरू करने और दूसरी सहूलियतें देने की मांग की है।