देश की सभी नदियों को एक-दूसरे से जोड़ने की दिशा में भले ही अभी मंथन चल रहा हो, लेकिन कभी कालीननगरी की लाइफलाइन रही मोरवा के अस्तित्व बचाने की कवायद शुरू हो गई है। साल के लगभग सात माह सूखी रहने वाली मोरवा नदी में 12 महीने एक छोर से दूसरे छोर तक जल प्रवाह बनाने की दिशा में प्रशासन ने पहल शुरू कर दी है। जिला प्रशासन ने एक कमेटी गठित की है, जो नदी में अनवरत पानी रखने की संभावनाओं पर काम कर रही है। मोरवा के दिन लौटे तो ढाई हजार एकड़ खेती फिर लहलहा उठेगी।
इलाहाबाद के केहुनी के समीप से निकलकर मोरवा नदी करीब 45 किमी के दायरे का सफर करते हुए भदोही में वरुणा नदी से मिलती है। करीब तीन दशक पूर्व तक मोरवा नदी को सिंचाई के मामले में भदोही का लाइफलाइन के रूप में जाना जाता था। इस नदी के सहारे तटवर्ती गांवों के किसान करीब ढाई हजार एकड़ खेतों की सिंचाई करके लहलहाती फसलें उगाते थे। गुजरते समय के साथ ही मोरवा के आसपास इलाकों में अतिक्रमण होता गया और जिले की लाइफलाइन अपने वजूद को तरसने लगी। देखरेख के अभाव में बारिश को छोड़कर साल के आठ माह यह नदी सूखी रहती है।
सांसद वीरेंद्र सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही नदी के अस्तित्व को बचाने की पहल शुरू की, लेकिन सांसद बनने के बाद मोरवा नदी में कई स्थानों पर खुदाई कराई, जहां भीषण गर्मी में भी पानी है। सांसद ने जिला योजना की बैठक में भी इस मामले को उठाया।
उल्लेखनीय है कि जिलाधिकारी प्रकाश बिंदु ने सांसद के प्रयास को आगे बढ़ाते हुए एक कमेटी का गठन कर दिया, जो मोरवा में हर समय पानी होने के संभावनों को तलाशेगी। लघु सिंचाई विभाग और मनरेगा के माध्यम से नदी की स्थिति बेहतर करने की ओर कदम बढ़ गए हैं।