फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अपने ही गांव में बेगाने हो गए हैं प्रवासी

विज्ञापन
विज्ञापन
भदोही। कोविड-19 और लॉकडाउन लगने के बाद से हर रोज प्रवासी भदोही पहुंच रहे हैं। हाल यह हो गया है कि अपने गांव में भी उनके साथ बेगानों जैसा बर्ताव हो रहा है। उनका कहना है कि वर्षों परदेस में रहने के बाद वहां तो किसी ने आसरा दिया नहीं घर गांव पहुंचने पर भी अलग-थलग रहना पड़ रहा है। भदोही ब्लॉक के ग्राम रघुनाथपुर के प्रमोद यादव के लिए लॉकडाउन के डेढ़ से दो महीने किसी भयावह तस्वीर से कम नहीं है।
विज्ञापन

मुंबई से गत दिनों लौट कर फिलहाल गांव में ही क्वारंटीन हैं। एक होटल में काम करने वाले प्रमोद को पहली बार लगा कि परेशानी क्या होती। खास बात यह है कि परेशानी आई भी तो एक साथ कई समस्या लेकर आई। पिछले तीन माह से एक पैसा घर तो भेज नहीं सके। मुंबई में होटल में ही पूंजी ही खाते थे। हाल यह हो गया कि जो लोग वहां हर रोज हाल चाल पूछ लेते थे। उन्होंने भी मेरे हाल पर छोड़ दिया। असली समस्या तो तब शुरू हुई जब वाराणसी आने वाली ट्रेन से रवाना हुए। ट्रेन वाराणसी न आकर उड़ीसा पहुंच गई। गर्मी, भूख और प्यास के बीच किसी तरह ट्रेन को वापस लखनऊ लाया गया, जहां से भदोही लौट पाए। अब वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। फिलहाल गांव में एकांतवास में हैं।
मुंबई में मार्केटिंग का कार्य करने वाले ग्राम अमरौना के आकाश सिंह बताते हैं कि प्रतिदिन यह सोच कर बीत रहा था कि कहीं अंतिम दिन न हो जाए। एक एक पल घर की याद में बीतता। घर से लोग फोन करते करते रोने लगते। यह सोचता कि घर पहुंच पाएंगे भी या नहीं। इसी बीच कुछ लोगों ने एक ऑटोरिक्शा कर मुझे भी साथ भदोही चलने को राजी किया। ऑटो रिक्शा वाले ने प्रति व्यक्ति तीन हजार रुपये लिए और घर पहुंचाया। रास्ते में कुछ सामाजिक संगठनों ने भोजन-पानी कराया अन्यथा कहीं एक भी दुकान नहीं खुली थी। सोचता हूं कि ऐसे दिन पुन: लौट कर न आएं। अब सरकार से प्रार्थना है कि हमें रोजगार उपलब्ध कराए अन्यथा हमारा भ विष्य चौपट हो जाएगा। फिलहाल में एकांत में रह रहा हूं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें