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लॉकडाउन में महंगी हुई गृहस्थी

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ज्ञानपुर। लॉकडाउन की पाबंदियों का असर अब रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगा है। तमाम सख्ती के बाद भी दैनिक उपयोग की सामग्री पर कृत्रिम महंगाई रोके नहीं रुक रही। मांग के अनुरूप आपूर्ति न हो पाने के कारण कुछ वस्तुएं वास्तव में महंगी हुईं हैं तो कई पर लॉकडाउन के बहाने बनावटी महंगाई थोप दी गई है। इसके चलते आम जनता की जेब ढीली की जाने लगी है।
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लॉकडाउन में सबसे ज्यादा महंगाई का असर खाने-पीने की चीजों पर देखने को मिला है। इससे तमाम साधारण परिवारों की रसोई का बजट हिलने लगा है। पखवारेभर पहले तक सिंघाड़े के आटे का 250 ग्राम का जो पैकेट 35 रुपये में बेचा जाता था, वह इस समय स्थानीय दुकानों पर 70 रुपये में मिल रहा है। यानी कि 280 रुपये किलो। लॉकडाउन से पहले तक अरहर की दाल 70 से 80 रुपये किलो के भाव में थी, मगर इन दिनों यह 100 रुपये किलो के हिसाब से बेची जा रही है। रिफाइंड तेल 110 से 115 रुपये और सरसों का तेल 110 से बढ़कर 120 रुपये प्रति लीटर हो गया है। चने का बेसन 80 रुपये किलो और मटर का बेसन 64 रुपये किलो बिक रहा है। जबकि पहले यह क्रमश: 70 और 55 रुपये किलो के हिसाब से मिल रहे थे। सूजी 32 से बढ़कर 36 रुपये किलो हो गई है। इसी हिसाब से रोजमर्रा की जरूरत के ज्यादातर सामान महंगे कर दिए गए हैं। सुबह 7 से 10 बजे के बीच विभिन्न बाजारों में दुकानें खुल रहीं हैं। उन पर खरीदारों की भीड़ लग रही है। लेकिन, लॉकडाउन में इस भीड़भाड़ को दुकानदारों ने मुनाफाखोरी के लालच में जमकर कैश कराना भी शुरू कर दिया है। स्थानीय स्तर पर ही सामान के दाम 20 से 25 तक बढ़ा दिए गए हैं। महंगाई के बाबत फुटकर दुकानदारों की दलील यह है कि थोक मार्केट में ही सामान महंगे मिल रहे हैं। इससे विवश होकर हमें मुनाफा रखकर महंगा बेचना पड़ रहा है। जबकि थोक दुकानदारों का कहना है कि पर्याप्त मात्रा में माल आ ही नहीं पा रहा। इससे परेशानी हो रही है।
सभी सामान की पर्याप्त आपूर्ति हो रही है। लॉकडाउन के कारण स्थानीय स्तर पर सामान की कीमत बढ़ाना गलत है। इसकी जांच कराई जाएगी। जो दुकानदार गलत करता पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई कराई जाएगी।
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राजेंद्र प्रसाद, जिलाधिकारी
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