भदोही। महानगरों से लौट रहे कामगारों और मेहनतकशों की परेशानी ज्यो की त्यो बनी हुई है। लोगों का कहना है कि वहां भी काम नहीं था और घर पर भी बेरोजगार होकर रह गए हैं। ऐसे में कोविड-19 से उन पर दोहरी मार पड़ रही है। अमहदपुर फुलवरिया के दिनेश चौहान और घनश्याम चौहान सूरत से लौटने के बाद फिलहाल घर पर ही बिता रहे हैं। काम तो करना चाहते हैं, लेकिन उनका कहना है कि कोई बात करने को तैयार नहीं है तो काम कौन देगा?
दिनेश और घनश्याम दोनों सूरत में साड़ी उत्पादक इकाई में काम करते थे। लॉकडाउन से पहले उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी। जितना कमाते थे उसी में जीते थे। लॉकडाउन 25 मार्च को लगने के पहले दिन ही साड़ी इकाई में उत्पादन ठप हो गया। कंपनी ने काम पर आने से रोक दिया। हालांकि हम लोगों को हर सहूलियतें देने का वादा तो किया गया है लेकिन तब तक वे लोग घर लौट आए। वापस जाने पर कुछ मिलेगा या नहीं यह भी उन्हें नहीं पता। बकौल घनश्याम खोली का किराया देना भी उनके लिए मुश्किल हो गया था। किसी तरह भोजन की व्यवस्था करते वे दिन गिन रहे थे। पहले हम लोगों को विश्वास था कि लॉकडाउन कुछ दिन का होगा लेकिन जब लंबा खिंचने लगा तो तो उनका धैर्य जवाब दे गया।
घनश्याम के अनुसार 12 मई को उन तीन लोगों ने लौटने के लिए भाड़े पर ट्रक वाले से बातचीत की। प्रति व्यक्ति तीन हजार रुपये में ट्रक लेकर हम लोगों को घर चला और तीसरे दिन हम लोग घर पहुंच गए। घर पहुंच कर भी अधिक खुशी नहीं मिली, क्यों कि जेब में पैसे नहीं थे। हम लोगों को बेरोजगारी की चिंता सता रही है। हम लोगों ने कई जगह काम की तलाश की लेकिन कोरोना के भय से लोग बात तक करने को तैयार नहीं हैं। यदि यही हाल रहा तो हमारे सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। घनश्याम ने कहा कि हम लोग प्रधानमंत्री जी से प्रार्थना करते हैं कि हमारे लिए रोजगार की व्यवस्था कराएं। राशन की व्यवस्था हम स्वयं कर लेंगे।