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स्वच्छ सियासत की नींव पर खड़ा हो मजबूत लोकतंत्र

Thu, 02 Mar 2017 01:50 AM IST
bhadohi hindi news
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 सचमुच, राजनीति की स्वार्थी गलियों में क्षेत्र, प्रदेश और देश के विकास को उलझाना ठीक नहीं। स्वच्छ सियासत की नींव पर ही मजबूत लोकतंत्र की इमारत खड़ी की जा सकती है। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली जनप्रतिनिधित्व की एक-एक ईंट ईमानदारी और निष्ठा की आंच में पकी होनी चाहिए। तभी बात बनेगी। इसमें हमारी-आपकी भूमिका सबसे अहम है। कब तक बुनियादी समस्याओं का रोना रोया जाएगा। बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मसले अगर अब भी चुनौती बने हैं तो कहीं न कहीं हमारा गलत चयन जिम्मेदार हो सकता है। बुधवार को अमर उजाला की ओर से सुरियावां के पीस कॉटेज स्कूल में आयोजित मंथन कार्यक्रम में यह तथ्य उभरकर सामने आए।
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विभिन्न विद्यालयों की शिक्षिकाओं ने मौजूदा राजनीति की दशा और दिशा पर बेबाकी से टिप्पणी की। कहा कि अब समय आ गया है कि सिस्टम में खामी की सही वजह ढूंढी जाए। मंथन में महिलाओं की सुरक्षा से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और अन्य मसलों पर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर बेबाकी से रायशुमारी हुई। शिक्षिकाओं ने कहा कि बहुत हो गया। कब तक झूठे वादों और दावों पर हमारा अनमोल मतदान जाता रहेगा।  
 वंदना मौर्य ने कहा कि मेरे गांव में तमाम अपात्र लोगों को राशन कार्ड बांट दिया गया है, जबकि जो लोग पात्र हैं, उन्हें अपेक्षाकृत गौरतलबी नहीं मिली। इसके लिए कौन जिम्मेदार है। जनप्रतिनिधियों ने भी ध्यान नहीं दिया। कायदे से भौतिक सत्यापन होना चाहिए था।
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 अर्चना दुबे कहती हैं कि चुनाव के समय नेताजी लोग तमाम दावे करते हैं, लेकिन बाद में हालचाल पूछने नहीं आते। गांव की सड़क पर चलना मुश्किल हो गया है। लड़कियों की उच्च शिक्षा का कोई केंद्र क्षेत्र में नहीं है। बीएससी की पढ़ाई के लिए यहां से ज्ञानपुर जाना पड़ता है।
स्वागता शाह ने कहा कि क्षेत्र में महिला शिक्षा के मसले पर बहुत कुछ करने की जरूरत है। सुरियावां जैैसी जगह पर अवसर बहुत हैं, लेकिन विकास के कोई कार्य नहीं हुए। बच्चों के खेलने के लिए पार्क तक नहीं है। इसे इस चुनाव में मुद्दे के रूप में उठाया जाना चाहिए।  
 शिक्षिका मधुबाला सिंह युवाओं की शिक्षा के मसले पर आवागमन के साधनों की दुर्व्यवस्था को बहुत बड़ा कारक मानती हैं। कहा कि एक तो उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को दूर जाने की मजबूरी, दूसरे आवागमन का बेतरतीब खर्च और साधनों की कमी फजीहत बनी है।
 नीलम ने कहा कि सुरियावां को तहसील बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है, लेकिन इसे केवल चुनाव के समय याद किया जाता है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे को मूर्त रूप देने के मसले पर किसी जनप्रतिनिधि ने संजीदगी नहीं दिखाई। अब चुनाव आया है तो फिर मामला उछला है।
 कनिका कहती हैं कि जनता का नेतृत्व करने वाला शिक्षित होना चाहिए ताकि वह जनता की समस्याओं को अपने विवेक का इस्तेमाल कर निपटा सके। जनप्रतिनिधित्व कमजोर हाथों में नहीं होना चाहिए। चुनाव में हम सभी की बेहतर प्रतिनिधि चुनने की जिम्मेदारी है।
 नाज हाश्मी ने कहा कि इतने बड़े इलाके में जूनियर हाईस्कूल के बाद छात्रों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई ढंग का संस्थान तक नहीं है। यहां मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी बनना चाहिए। साथ ही वाराणसी और इलाहाबाद को आवागमन के साधनों से सीधे जोड़ा जाना चाहिए।
श्रद्धा उपाध्याय ने कहा कि अगर स्कूल का वाहन न हो तो मैं स्कूल नहीं पहुंच सकती। एक तो सड़क सही नहीं है, ऊपर से क्षेत्र का माहौल अकेली महिला के निकलने के लिए ठीक नहीं है। महिला सुरक्षा के नाम पर जनप्रतिनिधि ध्यान नहीं दिए। अब सोचना पड़ेगा।
 रीता मौर्या ने कहा कि बेरोजगारी का आलम यह है कि युवाओं को पलायन करना पड़ रहा है। अगर स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होता तो ऐसी नौबत नहीं आती। इसमें जन्प्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति भी मायने रखती है, जो कहीं नहीं दिखती।
 प्रीती दुबे ने अगर गंभीर बीमारी या आपातकाल की स्थिति आ जाए तो मरीज को बेहतर इलाज के लिए वाराणसी या इलाहाबाद जाना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर कोई बेहतर इंतजाम नहीं। निजी अस्पताल में सभी उपचार करा नहीं सकते। हमारे राजनीतिज्ञ इन मसलों पर संजीदा नहीं हैं।
 रितु श्रीवास्तव ने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान का नारा खूब दिया जाता है, लेकिन अगर सुरियावां बाजार में किसी महिला को जरूरत पड़ जाए तो शौचालय कहीं भी सुलभ नहीं हो पाता। गांवों में भी लोग खुले में शौच कर प्रदूषण फैलाने को विवश हैं। केवल नारों में चल रहा है। ्र
  करिश्मा सिंह ने कहा कि गांव में स्कूल, 108 एंबुलेंस की सेवाएं केवल दिखाने भर की हैं। क्षेत्र में एक कोचिंग संस्थान होना चाहिए, जो गरीब बच्चों को अच्छा मार्गदर्शन कर उच्च पदों पर बैठाए। आखिर जनप्रतिनिधि किस बात के लिए चुनकर संसद, विधानसभा में भेजे जाते हैं।
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