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संस्कृत के संवर्धन में डॉ. कपिल का विशेष योगदान

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विश्व भारती अनुसंधान परिषद ज्ञानपुर और चतुर्वेद संस्कृत प्रचार संस्थानम वाराणसी की ओर से संस्कृत विद्वान डॉ. कपिलदेव द्विवेदी की जयंती पर उनके अवदान विषय पर सोमवार को ऑनलाइन राष्ट्रीय व्याख्यान गोष्ठी आयोजित की गई। कुलपति डॉ. प्रो. रूप किशोर शास्त्री ने कहा कि वेद और संस्कृत भारतीय, संस्कृत और भारत की आत्मा हैं। दोनों पर ही डॉ. कपिल ने लेखनी चलाई। उनके लिखे ग्रंथ मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। उनके लिखे ग्रंथों में वैज्ञानिकता, मनोवैज्ञानिकता, दार्शनिकता, आध्यात्मिकता का समन्वय है। इसमें विभिन्न प्रांतों से 150 से अधिक विद्वानों और शोध छात्रों ने प्रतिभाग किया।
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इस अवसर पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. हरिप्रसाद ने बताया कि संस्कृत जीवंत भाषा है। संस्कृत के संवर्धन में डॉ. कपिल देव द्विवेदी का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी रचनाओं से देशी और विदेशी हजारों छात्रों ने संस्कृत सीखी है। संस्कृत शिक्षा से लेकर प्रौढ़ रचानानुवाद कौमदी तक मनोवैज्ञानिक पद्यति से लिखी गई है। आचार्य सुद्युम्न आचार्य ने कहा कि डॉ. कपिल संस्कृत के लिए समर्पित थे। उन्होंने वेद को जनसामान्य तक पहुंचाया। वेद के वैज्ञानिक तथ्यों को प्रगट किया। इससे वैज्ञानिकों के लिए शोध का मार्ग प्रशस्त हुआ। लखनऊ से डॉ. नवलता ने कहा कि डॉ. द्विवेदी ने वेद के वास्तविक, तात्विक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक अर्थ का प्रणयन किया। संस्कृत जीवन शैली के वे आदर्श ऋषि थे। कुलपति डॉ. प्रो. रूप किशोर शास्त्री ने कहा कि वेद और संस्कृत भारतीय, संस्कृत और भारत की आत्मा हैं। दोनों पर ही डॉ. कपिल ने लेखनी चलाई। उनके लिखे ग्रंथ मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। उनके लिखे ग्रंथों में वैज्ञानिकता, मनोवैज्ञानिकता, दार्शनिकता, आध्यात्मिकता का समन्वय है। विश्व भारतीय अनुसंधान परिषद की ओर से डॉ. कपिल देव द्विवेदी स्मृति विश्व भारतीय सम्मान 2021 प्रो. रामकिशोर शास्त्री, प्रो. हर प्रसाद, डॉ. सुद्युम्न आचार्य और डॉ. नवलता को प्रदान किया गया। व्याख्यान में आचार्य विमलेश सुखवाल, विजय पांडेय, शंभु त्रिपाठी, डॉ. चंद्रकांत शुक्ल, डॉ. भारतेंदु द्विवेदी आदि शामिल रहे।
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