मोढ़ के मेला की बारी में धनुषयज्ञ मेले में मौत का कुआं।
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मोढ़। ऐतिहासिक परंपरा को संजोए मेला की बारी का धनुष यज्ञ मेला का बुधवार को शुभारंभ हो गया। दो दिसंबर को भगवान श्रीराम के खिचड़ी खाने के बाद मेले का समापन हो जाएगा। दशकों से होने वाले मेले में पूरी रामलीला का मंचन होता है। महरभा को अयोध्या तो मेला की बारी को जनकपुरी की संज्ञा दी गई है। जिले के ही नहीं आसपास के जिले के हजारों श्रद्धालु मेले में पहुंचते हैं। सुरक्षा के मद्देनजर पुलिसकर्मी भी मेले में तैनात किए गए हैं।
बुधवार को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मेले का शुभारंभ हुआ। अयोध्या बनी महरभा में भगवान श्रीराम का जन्म हो गया है। 28 को सराई जलाने की प्राचीन परंपरा निभाई जाएगी। मेला की बारी क्षेत्र में जिसे लोग जनकपुरी की संज्ञा देते हैं। 29 को बारी फुलवारी का मंचन और 30 को धनुष यज्ञ का आयोजन होगा। एक दिसंबर को प्रभु श्रीराम और सीता का विवाह तो दो दिसंबर को प्रभु खिचड़ी की रस्म अदा करेंगे। मान्यता है कि मेले में महिलाएं हलवा-पूड़ी चढाती हैं। मेले में झूला और सर्कस के साथ ही तमाम दुकानें सज गई हैं। महिलाओं के लिए विशेष मीना बाजार का आयोजन किया गया है। मेले की सबसे बड़ी खासियत है कि जो भी लोग मुंबई, दिल्ली समेत अन्य महानगरों में रहते हैं छुट्टी लेकर घर आते हैं। क्षेत्र में यह एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मेले में सबसे अधिक भीड़ एक और दो दिसंबर के दिन होगा।
सैकड़ों साल का है पुराना इतिहास
मोढ़। मेला की बारी में लगने वाले धनुष यज्ञ मेले का पुराना इतिहास है। बुजुर्गों का कहना है कि सैकड़ों साल पूर्व यहां एक संत आए थे, जिनका नाम श्री बाबा बालक दास था। उन्होंने बताया था कि इस स्थान पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरण पड़े हैं और वहीं पर अपना त्रिशूल गाड़ दिए। उसी के बाद से शुरू हुआ मेला आज भी हो रहा है। मेला समिति के अध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने भी इसकी पुष्टि की।