भदोही। ग्राम हरियांव के राजेंद्र पांडेय के लिए मुंबई प्रवास उनके जीवन के सबसे खराब समय के रूप में दर्ज हो गया।
वे जब तक मुंबई में रहे उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन जब वे पैदल अपने घर के लिए रवाना हुए तो उन पर समस्याओं का पहाड़ टूट पड़ा। वे बताते हैं कि वे 27 अप्रैल से तीन मई तक रास्ते में रहे। इस दौरान कभी पैदल तो कभी वाहनों पर लिफ्ट मांगते भदोही पहुंचे। इस दौरान रास्ते भर में खाने को अन्न नहीं मिला। बिस्कुट खाकर पानी पीकर चलते रहे।
अंधेरी में एक सेक्योरिटी एजेंसी के लिए काम करने वाले राजेंद्र बताते हैं, उन्हें वहां कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन, जिस कालोनी में रहते थे वहां कई पॉजिटिव मरीज मिल जाने से उन्हें भय हो गया कि कहीं पूरी कालोनी सील न कर दी जाए। इस से पहले कि अधिकारी सील करने के लिए आएं वे घर के लिए निकल जाना चाहते थे। बताते हैं कि 27 अप्रैल के दिन वहां से पैदल चलने के लिए तीन और साथी मिल गए। नासिक तक पैदल आए। वहां से कभी पैदल चलते तो कभी लिफ्ट मिल जाती। ऐसे वे कानपुर पहुंच गए। कानपुर से ट्रक के माध्यम से गोपीगंज आ गए। जहां से पैदल चलकर घर पहुंचे। कहा कि घर पहुंचने में दिक्कत तो हुई लेकिन घर आ रहा हूं यह सोच कर उनका दर्द दूर हो जाता था।
ग्राम हरियांव के ही दिनेश यादव गोरेगांव में आटो रिक्शा चलाते थे। लॉकडाउन के पहले तक सबकुछ ठीक ठाक था। जिस दिन से लॉकडाउन हुआ उसी दिन से उनका जीवन अंधकारमय हो गया। कभी घर पहुंच जाने का मन करता तो कभी वहीं पर लॉकडाउन बिताने की सोचते। इस दौरान वहां सामाजिक संगठनों से खाने के लिए मिल जाता था। एकाएक 9 मई तो सूचना मिली की एक ट्रक वाराणसी की ओर जा रही है तो कर्ज लेकर तीन हजार ट्रक वाले को देकर घर रवाना हुए। ट्रक ने दो दिन बाद उन्हें रजपूरा चौराहे पर उतार दिया। जहां से थर्मल स्क्रीनिंग कराने के बाद वे गांव में क्वारंटीन हो गए। अब रोजगार की समस्या से चिंतित हैं।