अमर उजाला ब्यूरो
भदोही। आला हजरत अहमद रजा खां फाजिल बरेलवी ने सुन्नीयत का झंडा बुलंद रखा। उन्होंने भटकों को सही राह दिखाई। सुन्नियत को फरोग देने में उनका अहम किरदार था और हमेशा रहेगा। ये बातें बीती रात मर्यादपट्टी स्थित कुतुब-ए भदोही के आस्ताने पर हुए जश्ने इमाम अहमद रजा कांफ्रेंस को खिताब करते हुए लखनऊ से तशरीफ लाए मुफ्ती मौ.एहतेशाम कादरी ने कही।
उन्होंने आला हजरत इमाम अहमद रजा के अहमियात बयां करते हुए कहा कि आला हजरत 1857 में बरेली में पैदा हुए। महज 13 वर्ष की उम्र में तालीम से फारिग हो गए थे। और इसके बाद दीन की खिदमत में लग गए थे जो आखिरी सांस कर करते रहे। बताया कि उन्होंने एक हजार से ज्यादा किताबें लिखी। उनमे परहेजगारी कूट कूट कर भरी थी। जईफी (वृद्धावस्था) के आलम में जब चलने की ताकत नहीं थी तो भी दूसरों के सहारे मस्जिद जाते थे। मुफ्ती ने बताया कि हमेशा जमात से ही नमाज पढ़ी। उनका मकाम ऊंचा था और हमेशा ऊंचा रहेगा। उन्होंने जो रास्ता अपनाया और दिखाया उस पर अमल करने की जरूरत पर जोर दिया।
पटना से तशरीफ लाए मुफ्ती सुल्तान रजा ने मां बाप के मर्तबे पर रोशनी डाली। बताया कि मां के कदमों में जन्नत होती है। मां की दुआ खाली नही जाती। वो औलाद बदनसीब हैं जिन्होंने मां-बाप का दिल दुखाया। लोगों को पड़ोसी का हक बताया और कहा कि पड़ोसी को सच्चा हमदर्द समझो। जरूरतमंद हों तो उनकी मदद करो। छल व कपट से दूर करने की हिदायत दी। सदारत मौ.कुतुबुद्दीन व निजामत आसिफ रजा ने की। कारी आलम बाराबंकवी, मुफ्ती बख्तियार आलम, मौ.मोहियुद्दीन ने भी खिताब किया। शाहिद रजा, अहमद रजा, मकबूल भदोहवी, नेेेहाल हबीबी, कारी आफताब हबीबी ने नाते पाक पेश किया। मुख्य रूप से मौ.रब्बानी, मौ.हसरत, जमील नेता, नुरैन खां, तालिब खां, बच्चा खां आदि उपस्थित रहे।