ज्ञानपुर। रबी सीजन की फसलों गेहूं, सरसों, आलू आदि में मौसमी रोगों के लक्षण दिखने लगे हैं। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। साथ ही गेहूं की फसल के लिए खर-पतवार दुश्मन बन चले हैं। जहां-तहां चौड़ी एवं सकरी पत्तियों वाले गुल्ली डंडा, चटरी-मटरी, बथुआ, कृष्णनील आदि खर-पतवारों से गेहूं के खेत पट गए हैं। जबकि सरसों और आलू में माहो और झुलसा रोग का प्रकोप शुरू हो गया है।
कृषि विशेषज्ञों ने खर-पतवार और कीट रोगों के प्रकोप से बचने के लिए किसानों को अपनी फसल की निरंतर निगरानी करने की सलाह दी है। जिला कृषि अधिकारी अशोक कुमार ने कहा कि गेहूं में संकरी पत्तियों वाले खरपतवार दिखे तो सल्फोल्फ्यूरॉन 75 प्रतिशत डब्ल्यूजी 33 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से तीन सौ लीटर पानी में घोलकर पहली सिंचाई के बाद छिड़काव करना चाहिए। चौड़ी पत्तियों वाले खरपतवार के नियंत्रण के लिए मेटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 20 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 20 ग्राम मात्रा को पांच सौ लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रथम सिंचाई के बाद फ्लैट फैन नॉजिल से छिड़काव करें। मकोय के नियंत्रण के लिए कारफेंट्राजोन इथाइल 40 प्रतिशत डीएफ की 50 ग्राम मात्रा को पांच सौ लीटर पानी में घोलकर प्रति ह ेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना मुफीद रहता है। उन्होंने बताया कि राई और सरसोफं में तापमान गिरने पर माहो कीट का प्रकोप बढ़ता है। ऐसे में एजाडिरैक्टिन, डाईमेथोएट या ऑक्सीडिमेटॉन में से किसी एक का निर्धारित मात्रा के अनुसार छिड़काव करना चाहिए। आलू में अगैती या पछैती झुलसा रोग लगने पर पत्तियों पर भूरे और काले धब्बे पड़ जाते हैं। ऐसे में कॉपर आक्सी क्लोराइड, मैंकोजेब या जिनेब की निर्धारित मात्रा छह सौ से आठ सौ लीटर पानी में घोलकर प्रति पौधों पर छिड़काव करना चाहिए। कहा कि बदलते मौसम में फसलों को लेकर किसानों को सतर्क रहना चाहिए।