वाणिज्य मंत्रालय ने कालीन उद्यमियों को निर्यात पर मिलने वाले ड्यूटी ड्रॉ-बैक को लगभग नगण्य कर दिया है। हस्तनिर्मित ऊनी कालीनों पर 9.20 प्रतिशत प्रति वर्ग मीटर के बजाए अब केवल 3.7 प्रतिशत (अधिकतम 303.20 रुपये) मिलेंगे। मानव निर्मित धागों के कालीनों पर 8.90 प्रतिशत प्रति वर्ग मीटर की बजाए अब महज 1.70 प्रतिशत (अधिकतम 118.10 रुपये) से ही संतोष करना पड़ेगा। नोटबंदी, जीएसटी के बाद कालीन उद्योग को यह केंद्र सरकार का तीसरा बड़ा झ़टका बताया जा रहा है। नई दरों की अधिसूचना शुक्रवार को हुई, जो एक अक्टूबर से प्रभावी हो जाएगी।
वर्तमान में उद्यमी मुख्यत: नॉटेड कालीन, दरी-हैंडलूम और टफ्टेड कालीनों का उत्पादन कर रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में मानव निर्मित धागों का उपयोग कालीनों में बढ़ा है। मंत्रालय से जारी नई दरों की सूची में सिल्क कालीन निर्माताओं को बख्शा गया है, जिसमें मामूली कमी की गई है। अब तक 10.70 प्रतिशत प्रति वर्ग मीटर (अधिकतम 4150 रुपये) को घटाकर नौ प्रतिशत (अधिकतम 3490.70 रुपये) किया गया है। शुद्ध ऊनी दरियों पर अब तक मिलने वाली ड्रॉ-बैक दर 9.20 प्रतिशत (अधिकतम 311 रुपये) से घटाकर 3.70 प्रतिशत (अधिकतम 125.10 रुपये) कर दी गई है। जबकि मानव निर्मित धागों की दरियों को 8.90 प्रतिशत (अधिकतम 279 रुपये) से कम कर 1.70 प्रतिशत (अधिकतम 51.60 रुपये) किया गया है।
टफ्टेड कालीन भी क्षेत्र में बहुतायत बनते हैं। इस पर अब तक ड्रॉ-बैक 9.20 प्रतिशत (अधिकतम 285 रुपये) के स्थान पर नई अधिसूचना के मुताबिक अब केवल 3.10 प्रतिशत (अधिकतम 96 रुपये) ही मिल सकेंगे। मानव निर्मित धागों से बने टफ्टेड कालीनों की दर 8.90 प्रतिशत (अधिकतम 266 रुपये) से घटाकर 1.50 प्रतिशत (अधिकतम 43.40 रुपये) किया गया है। पूर्णत: सूती कालीनों पर मिल रहे आठ प्रतिशत (अधिकतम 65 रुपये) ड्रॉ-बैक को घटाकर 2.30 प्रतिशत (अधिकतम 18.70 रुपये) कर दिया गया है। एकाएक ड्रॉ-बैक की दरें घटा देने से उद्यमियों में खलबली मच गई है। कहा जा रहा है कि इसका असर हर स्तर के निर्यातकों पर पड़ेगा, लेकिन मझोले निर्यातकों की दूकान बंद हो जाएगी।
उद्योग में तबाही आएगी
केंद्र सरकार के इस कदम से समूचे उद्योग में तबाही आएगी। नोटबंदी और जीएसटी से जूझ रहे निर्यातकों के बारे में फिलहाल सहानुभूतिपूर्वक सोचा जाना चाहिए था। सरकार के इस कदम से हम विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा करने लायक नहीं रह गए। इसका असर आने वाले महीनों में कालीन निर्यात के आंकड़ों में देखने को मिलेगा। - पीयूष बरनवाल, मानद सचिव, अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ
मझोले निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ी
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय का यह फैसला कालीन उद्योग पर भारी पड़ेगा। इससे छोटे और मझोले निर्यातक खत्म हो जाएंगे। सैकड़ों छोटे निर्यातकों से जुड़े बुनकर, मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। देश में पहले ही बेरोजगारी बढ़ रही थी। इस निर्णय से और दिक्कतें सामने दिख रही हैं। - बसंत चांडक, कालीन निर्यातक, भदोही