प्रदूषण की मार से कालीन नगरी भी अछूती नहीं है। महानगरों के सापेक्ष यहां प्रदूषण काफी हद तक कम है लेकिन भदोही नगर में औद्योगिक संस्थानों से निकलने वाला दूषित पानी आसपास के आबोहवा को काफी हद तक प्रभावित कर रहा है। समय रहते अगर नहीं चेता गया तो आने वाले समय में मानव की मुश्किलें बढ़ जाएंगी।
प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित भदोही नगर व आसपास के इलाके हैं। कालीन कंपनियों से निकलने वाले केमिकल पानी को जहरीला बना रहा है। इससे नगर के कई मोहल्लों में कुपोषण समेत विभिन्न बीमारियों से लोग पीड़ित हैं। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ला ने कहा कि भदोही में प्रदूषण की स्थिति अन्य महानगरों से ठीक है। भदोही नगर में डाइंग प्लांट से निकलने वाले पानी का शोधन न होने से दिक्कतें होती हैं। उन्होंने बताया कि कुछ माह पूर्व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच के बाद 45 डाइंग प्लांटों को सीज कर दिया था। उसके बाद उत्प्रवाह शुद्धीकरण यंत्र को उच्चीक़ृत करने पर कुछ प्लांटों को बहाल किया गया। उन्होंने कहा कि प्रदूषण के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए वन संरक्षण की जरूरत है। अधिक से अधिक पौधरोपण कर ही प्रदूषण के कोपभाजन से बचा जा सकता है। उन्होंने बताया कि जिले में ध्वनि प्रदूषण 66 से 75 डेसिबल ही है, जो सामान्य है। कभी कभार 75 डेसीबल से अधिक की ध्वनि होता है। प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए हर साल पौधरोपण किया जाता है लेकिन एक दशक के बाद भी जिले का वन क्षेत्र दायरा 0.1 फीसदी से अधिक नहीं हो सका।
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