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नहर व तालाब के पानी पर निर्भर हुये गोशाला

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ज्ञानपुर। शासन ने गोसंरक्षण को बढ़ावा देने के लिए आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन उनके रखरखाव को लेकर पूरी गंभीरता नहीं बरती जा रही है। वैकल्पिक तौर पर बनाए गए गो संरक्षण गृह प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर रह गए हैं। कहीं पानी तो कहीं चारे की किल्लत ने फरमान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिम्मेदारी संभाल रही समिति भी बजट होने के बाद भी हाथ खींच कर एक-दूसरे के ऊपर ठिकरा फोड़ने का काम कर रही हैं। यदि स्थिति न संभाली जा सकी तो आने वाले दिनों में पशुओं को पानी ही नहीं पेट भरने के लिए मोहताज होकर रह जाना पड़ेगा। इसका उदाहरण भी विकास खंड ज्ञानपुर के बड़वापुर तथा चकवा गोशाला पेश कर रहे हैं।
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बताते चलें कि जनपद में छुट्टा घूमने वाले पशुओं को संरक्षण के लिए शासन ने जिला प्रशासन को गोशाला बनवाने के लिए जमीन की उपलब्धता और बड़े पैमाने पर बजट का भी प्रावधान किया है। इस निमित्त मुख्य नहर से सटे गांव चकवा व बड़वापुर में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत गोशाला का निर्माण तो कराया दिया गया लेकिन वहां पर न तो पानी की व्यवस्था की जा सकी और न ही पर्याप्त मात्रा में चारे का। संचालक और मजदूर नहर संग तालाबों से पानी लाकर प्यास बुझाने में लगे हैं। जबकि शासन ने 612 करोड़ का बजट देकर पानी, रहने, चारे और लंबे-चौड़े परिसर का प्राविधान भी किया है। रखरखाव की निगरानी के लिए तहसील स्तर पर समिति का भी गठन किया गया है जो पशुपालन विभाग के साथ गोशालाओं की निगरानी करेगी, हालांकि ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा है। मजदूरों का कहना है कि जिला प्रशासन ने समय रहते समस्याओं का निराकरण नहीं कराया तो गर्मी के दिनों स्थिति और ही विकट होगी।

30 रुपये में पेट भर रहा पशुपालन विभाग
ज्ञानपुर। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. आईए खान ने बताया कि विभाग की ओर से गोशाला संचालकों को 30 रुपये प्रतिदिन चारे के लिए मिलता है। समिति के निर्देश पर संबंधित ग्राम पंचायतों खाते में धन भेजा जाएगा और बीमार होने पर समुचित उपचार के लिए टीम लगी है। पानी और चारे की बात समिति के संज्ञान में है। समिति ने बीडीओ ज्ञानपुर से पानी की व्यवस्था कराने का निर्देश दिया गया है।
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