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भारत की हिंदी हुई भारत में वीरान...

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ज्ञानपुर (भदोही)।
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अंग्रेजी छाती चढ़ी, पीछे खींचे टांग/ हिंदी के उत्थान का अजब सलोना स्वांग।
साहब अंग्रेजी पढ़े, हिंदी पढ़े किसान/ बुधुआ मुंह बाए फिरे, डबलू की है शान।।
सचमुच! इसमें कोई संदेह नहीं कि समय के साथ हिंदी का वैभव बढ़ा है, लेकिन हिंदुस्तान में हिंदी को जो मुकाम मिलना चाहिए, उससे वह कई पायदान पर वंचित रह गई है। स्वार्थ की राजनीति में हिंदी को अपनी समृद्धि का सबूत देने के लिए विवश कर दिया गया है। शब्द वैभव से सजी हिंदी भाषा की मौजूदा स्थिति पर भदोही जिले के साहित्यकारों की प्रतिक्रिया काबिलेगौर है।
साहित्यकार और कवि कृष्णावतार त्रिपाठी ‘राही’ उपरोक्त लाइनों को दोहराते हुए कहते हैं कि हमारा देश पहला ऐसा देश है, जो अपनी ही मातृभाषा का दिवस मनाकर अपमान करता है। आज ही के दिन 1949 में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल की गई हिंदी भाषा को वोट की राजनीति के दुष्चक्र में इस कदर धकेला गया कि आज तक उसे उसका वास्तविक स्थान नहीं मिल सका। वह हिंदी पर अपनी लाइन- सात समंदर पार भी अंग्रेजी का मान, भारत की हिंदी हुई भारत में वीरान... सुनाते हुए कहते हैं कि जब तक भाषा के नाम पर षड्यंत्र कर सत्ता हथियाने का खेल चलता रहेगा, तब तक हिंदी का समुचित उत्थान नहीं हो पाएगा। एक दिन के लिए अपनी भाषा का दिवस मनाने का क्या मतलब। यह वर्ष भर याद रहनी चाहिए। इस भाषा का हृदय इतना विशाल है कि इसने अन्य तमाम भाषाओं को आत्मसात कर लिया है।
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राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक और साहित्यकार डॉ. राजकुमार पाठक कहते हैं कि पहले की अपेक्षा हिंदी बहुत आगे बढ़ी है। अपनी समृद्धि के चलते हिंदी भाषा ने अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी सम्मानजनक स्थान बना लिया है। इस भाषा ने अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर संकीर्णता के दायरे को पीछे छोड़ दिया है। इससे इसका निरंतर विकास होता जा रहा है। हमारे देश के पहली पंक्ति के कई नेताओं ने विदेशों में हिंदी में संबोधन कर हिंदी का मान बढ़ाया है। यह देश की विविधता को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखती है। लेकिन, इसे राजनीति में नहीं फंसाया जाना चाहिए।
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