चौरी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीराम दुबे और समाजसेवी फारुख अली की ख्याति के चलते अलग पहचान रखने वाले रोटहां गांव की समरसता पर विस्फोट के बाद बारूद का बदनुमा दाग लग गया है। क्या गांव को उसकी पुरानी पहचान मिल सकेगी, यह सवाल क्षेत्र में आम हो चुका है। कहा जा रहा है कि धमाके के बाद हैंडग्रेनेड और आरडीएक्स की अफवाहें जिस तरह से फैलाई गईं, उससे रोटहां की छवि बेहद खराब हुई है।
आजादी के पहले से ही आबाद रोटहां क्रांतिकारियों की धरती और सामाजिक समरसतापूर्ण गांव के रूप में जाना जाता रहा है। आजादी की लड़ाई में भागीदारी निभाने से लेकर सामाजिक कार्यों में भी गांव की भूमिका जिम्मेदारीपूर्ण रही है। 1942 में मुंबई महाधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जब करो या मरो का नारा दिया था तब रोटहां निवासी पं. श्रीराम दुबे ने अपने साथियों के साथ परसीपुर रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया था। ऐसे वीर जवानों की धरती को इरफान की करतूत ने कलंकित किया है। दो दशक पहले क्षेत्र को एक जिम्मेदार कालीन निर्यातक फारुख अली के नाम से भी पहचान मिली थी। यह नाम आज भी कई किलोमीटर दूर तक के लोगों की जुबान पर रहता है। जिस दौर में पानी के लिए कुआं ही एकमात्र सहारा हुआ करता था, तब उन्होंने रोटहां समेत चौरी बाजार में हैंडपंप लगवाए थे। ऐसी पहचान रखने वाले रोटहां के दामन पर धमाके का बदनुमा दाग लग गया है। ग्रामीणों का कहना है कि भगवान न करे कि अफवाहें सच हो जाएं।