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दलीय निष्ठा बदलते रहे जीत-हार का समीकरण

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दलीय निष्ठा बदलते रहे जीत-हार का समीकरण
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बस्ती। नेताओं की दलीय निष्ठा जिले में जीत-हार के समीकरण को भी बदलती रही है। सियासत और जंग में सब जायज है, के फार्मूले पर कदमताल करने वाले नेताओं को इससे कभी जीत मिली तो कभी हार के भी कड़वे अनुभव से गुजरना पड़ा।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजे निश्चित रूप से भाजपा के पक्ष में गए हैं। लेकिन, बस्ती में पांच में चार सीटें विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के खाते में चले जाने से कई तरह की चर्चाओं को हवा दे गया है। इसमें सबसे अहम मुद्दा दल-बदल की राजनीति भी है, जिसका एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना रहा है। बात शुरू करते हैं महादेवा सुरक्षित विधानसभा सीट से। यहां से सपा-सुभासपा गठबंधन पर चुनाव जीते दूधराम 2007 में नगर पूरब सुरक्षित सीट से बसपा के हाथी पर सवार होकर विधानसभा का सफर कर चुके हैं। हालांकि 2002, 2012 और 2017 के चुनाव में भी उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन हार का सामना करना पड़ा।
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अब चलते हैं रुधौली विधानसभा क्षेत्र में, यहां से सपा के टिकट पर विधायक चुने गए राजेंद्र प्रसाद चौधरी भी 2007 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर विधानसभा क्षेत्र में रामनगर सीट से क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 2007 में रुधौली विधानसभा सीट रामनगर के नाम से जानी जाती थी। 2012, 2017 में भी बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन, हार का सामना करना पड़ा। वहीं, भाजपा के टिकट पर हर्रैया से दूसरी बार विधायक चुने गए अजय सिंह भी 2012 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे, लेकिन जनादेश उनके पक्ष में नहीं गया था। इसके बाद उन्होंने भाजपा का दामन थामा और 2017 में पहली बार विधायक चुने गए।
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पांच बार तीन दलों से विधायक चुने गए राम प्रसाद
जिले में कुर्मी बिरादरी की राजनीति का केंद्र रहे राम प्रसाद चौधरी ने इस चुनाव में कप्तानगंज की सीट अपने बेटे कवींद्र चौधरी को सौंप दी है। कवींद्र यहां से सपा के टिकट पर विधायक चुने गए हैं। लेकिन, उनके पिता राम प्रसाद चौधरी के लंबे सियासी सफर पर नजर डालें तो उनकी भी दलीय निष्ठा बदलती रही है। 1980 में राम प्रसाद चौधरी पहली बार कप्तानगंज सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े, लेकिन पांचवें नंबर पर रहे। 1985 में लोकदल, 1991 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और दूसरे नंबर पर रहे। 1993 में पहली बार सपा के टिकट पर विधायक चुने गए। 1996 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। 2002 में राम प्रसाद भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। 2007, 2012 में फिर से बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़े और दोनों बार जीते। लेकिन, 2017 में बसपा के टिकट पर कप्तानगंज से ही चुनाव हार गए।
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