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भारत छोड़ो आंदोलन: करो या मरो का आह्वान आज भी याद, 98 साल के रामसमुझ के जेहन में जिंदा है 1942 की दीवानगी

Sat, 08 Aug 2026 01:40 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अनिल ओझा,संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती

सार

रामसमुझ कहते हैं कि स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के बीच 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की ये यादें हमें बताती हैं कि आजादी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानियों की अमर गाथा भी है। जिसे कभी भुला नहीं जा सकता है।
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98 साल के राम समुझ ओझा की फोटो। - फोटो : 1
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विस्तार
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15 अगस्त को अपने देश में आजादी का गगनभेदी तराना फिर गूंजेगा। यह स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ है। आजाद भारत के इस चमक के पीछे की दास्तां सुनाने वाले अभी भी मौजूद हैं। जिले के हर्रैया तहसील के तिनौता गांव के रहने वाले 98 साल के रामसमुझ ओझा के जेहन में 08 अगस्त 1942 में छिड़े भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति दीवानगी अभी भी जिंदा है।

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संघर्ष, त्याग और बलिदान की कहानी वह जुबानी सुनाते हैं। कहते हैं कि आठ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के करो या मरो के आह्वान ने पूरे देश में ऐसी क्रांति की मशाल जलाई, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूले हिला दी थी। उस दौर को अपनी आंखों से न सिर्फ देखा था बल्कि कम उम्र होने के बाद भी आजादी के दीवानों के लिए गोपनीय बैठकों के आयोजनों में भूमिका भी निभाता रहा।

आज भी उन दिनों की यादों को अपने सीने में संजोए हुए हैं। जब पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतर आया था। गांवों और कस्बों तक आजादी की अलख पहुंच चुकी थी। उस समय मेरी उम्र महज 14 वर्ष की रही। 98 वर्ष की आयु में भी उस समय का मंजर अच्छी तरह याद है।

वह बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन सिर्फ एक आंदोलन नहीं था, बल्कि देशवासियों के सीने में आजादी की लौ जलाने वाला सैलाब था। उस समय गांव-गांव में सभाएं होती थीं। लोग स्वप्रेरणा से हाथों में तिरंगा लेकर अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे की गूंज करते हुए घरों से निकल पड़ते थे। पूरा देश आजादी के प्रति दीवाना हो गया था।

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों में जबरदस्त आक्रोश था। उस समय हम जैसे बच्चे भी आंदोलन में अपनी भूमिका निभाते थे। कई बार गांवों में आजादी के दीवानों की गोपनीय बैठकें होती थीं। आसपास के गांवों में उसकी जिम्मेदारी हम जैसे बच्चे ही संभालते थे।

उस समय स्वतंत्रता संग्राम के दीवाने बोरे पर बैठकर रणनीति बनाते थे। अंग्रेजों से बचने के लिए हम लोग उन्हें गुप्त रास्ते से बैठक स्थल लेकर आते थे। गांव में अंग्रेज न पहुंचे इसके लिए चारों तरफ रखवाली की जाती थी। स्वतंत्रता सेनानियों के संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में हर कोई मदद करता था।
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अंग्रेजी पुलिस के लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों के बावजूद लोगों का हौसला कमजोर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के बीच 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की ये यादें हमें बताती हैं कि आजादी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानियों की अमर गाथा भी है। जिसे कभी भुला नहीं जा सकता है।
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