बस्ती। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों कर्ज का अनियंत्रित मॉडल, बढ़ती आर्थिक तंगी और कर्ज की रकम का गलत उपयोग, मिलकर जिले में एक खतरनाक स्थिति पैदा कर रहे हैं। आसानी से मिलने वाले लोन ने गरीब परिवारों को राहत देने के बजाय उन्हें ऐसे कुचक्र में फंसा दिया है, जहां एक बार किस्त टूटने पर जिंदगी तक टूटने लगी है।
भानपुर के नरखोरिया और नगर थानाक्षेत्र के रौंसिंघापार में नलकूप कर्मी की हालिया आत्महत्या ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। दोनों मामलों में एक ही पैटर्न सामने आ रहा है। कर्ज की रकम का सही उपयोग नहीं हुआ, किस्तें न भर पाने पर लगातार प्रेशर बढ़ता गया और आखिरकार तनाव ने जान ले ली।
जिले में पिछले कुछ वर्षों में माइक्रो फाइनेंस कंपनी बाजार तेजी से फैलता गया है। गांव-गांव में एजेंट मौजूद, घर-घर पर वेरिफिकेशन, और समूह बनाकर लोन उपलब्ध कराने लगे। किसानों, मजदूरों, छोटे दुकानदारों और गृहणियों को 20 से 80 हजार तक का कर्ज बिना ज्यादा दस्तावेज के मिलने लगा। समस्या तब शुरू हुई जब कर्ज का उपयोग उत्पादन की बजाय उपभोग में होने लगा। जैसे मोबाइल, बाइक की डाउन पेमेंट, शादी-ब्याह, भोग-विलास या पुराना कर्ज चुकाने में रकम खपा दिए। गलत उपयोग के कारण रिटर्न नहीं मिला, और कुछ हफ्तों में किस्तें टूटनी शुरू हो गईं।
कागज पर सशक्तीकरण, हकीकत में दबाव : समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय बताते हैं कि माइक्रो फाइनेंस कंपनी का उद्देश्य गरीब परिवारों को छोटे कर्ज देकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना था। लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि कर्ज की आसान उपलब्धता ही संकट की जड़ है। ज्यादा एजेंट, ज्यादा लक्ष्य, ज्यादा कलेक्शन की रेस में कंपनियां बगैर जांच-परख के कर्ज बांट रही हैं। कर्ज का उपयोग बिजनेस में होना चाहिए, लेकिन खर्च हो रहा है दिखावे में आय पैदा न करने वाले खर्च पर रकम उड़ जाती है। यहां से शुरू होती है पहली किस्त का टूटना। एक समूह की गलती पर पूरा समूह दबाव में आता है। ग्रुप लोन मॉडल में यदि एक सदस्य किस्त नहीं चुका पाया तो दूसरे सदस्य भी दबाव में आते हैं। वसूली का दबाव सबसे कमजोर वर्ग पर पड़ता है। अधिकतर कर्ज महिलाओं के नाम पर, पर बोझ पूरे परिवार पर आ जाता है।