नगर बाजार। माह-ए-रमजान के पवित्र पर्व पर अकीदतमंदों ने अल्लाह की इबादत में रोजा रखने का क्रम जारी है। इस दौरान रोजेदार अमन-चैन और बरकत के लिए अल्लाह की इबादत पूरे उत्साह से कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय के विद्वान और उलेमा के अनुसार, रोजा रखना सिर्फ भूख-प्यास का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से मिलने वाली सबसे बड़ी नेमतों में से एक है। जिसकी फजीलत कुरआन-ए-पाक और हदीस में बार-बार बयान की गई है।
क़ुरआन-ए-करीम में अल्लाह फरमाते हैं। ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे फर्ज किए गए, जैसे तुमसे पहले वालों पर फर्ज किए गए थे। ताकि तुम परहेजगारी हासिल करों। इस आयत से साफ है कि रोजे का असली मकसद इंसान को गुनाहों से बचाना और अल्लाह का डर पैदा करना है। रमजान में रोजा 19 फरवरी को रखा गया। इसके बाद रोजेदार सहरी-इफ्तार, तरावीह और कुरआन तिलावत में मशगूल हैं। मौलाना जकीउल कादरी ने कहा कि कि रोजा अल्लाह के लिए खास है। अल्लाह फरमाते हैं रोजा मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा। यह हदीस बताती है कि रोजे में कोई दिखावा नहीं हो सकता है। इसलिए इसका अज्र बे-हिसाब है। संवाद