बस्ती। जिले के विक्रमजोत, कुदरहा और दुबौलिया विकास क्षेत्र के सरयू किनारे बसे 10 से 12 गांव बाढ़ और कटान की त्रासदी से जूझ रहे हैं। नदी का जलस्तर बढ़ते ही इन गांवों में तबाही शुरू हो जाती है। एक दशक पहले तक गांवों से तीन-चार किलोमीटर दूर बहने वाली सरयू अब कटान करते हुए आबादी तक पहुंच गई है।
पिछले दो-तीन वर्षों में नदी की तेज धारा कई गांवों के अस्तित्व पर संकट बन गई है। हर साल खेत, मकान और आबादी नदी में समा रही है, लेकिन प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और गांवों की सुरक्षा के लिए अब तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है। जिले के दक्षिणी छोर पर अयोध्या से संतकबीरनगर सीमा तक करीब 60 किलोमीटर में सरयू नदी बहती है। ढाई-तीन दशक पहले विक्रमजोत, दुबौलिया, बहादुरपुर और कुदरहा ब्लॉक के करीब 400 गांव बाढ़ से प्रभावित होते थे। इसके बाद बाढ़ से बचाव के लिए सरयू किनारे 81 किलोमीटर लंबाई में नौ तटबंध बनाए गए, जिससे लगभग 300 गांव सुरक्षित हो गए।
इसके बावजूद भौगोलिक परिस्थितियों के कारण 105 गांव नदी और तटबंध के बीच ही रह गए। इन गांवों के लिए न तो स्थायी सुरक्षा योजना बनी और न ही प्रभावी पुनर्वास नीति लागू हो सकी। बाढ़ खंड की नियमावली में केवल तटबंधों की सुरक्षा के लिए कार्य कराने का प्रावधान है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि सरकारी संपत्ति यानी तटबंधों की सुरक्षा ही प्राथमिकता है। ऐसे में कम आबादी वाले गांवों के लिए केवल विस्थापन का विकल्प बचता है, जबकि गांवों को सुरक्षित रखने की अलग व्यवस्था नहीं है।
इसी का नतीजा है कि वर्षों में कई गांव सरयू की धारा में समा चुके हैं। कुदरहा ब्लॉक के तिलकापुर और तारा सिंह का पुरवा, दुबौलिया के पहड़वापुर, विलासपुर, नई दुनिया, टकटकवा का आधा हिस्सा, कुर्मियाना और केवटहिया तथा विक्रमजोत के काशीपुर, अचलपुर, अचकवापुर, कटकवारपुर, डगडौआ, पूरे भंजीराम, हिमायूपुर और पूरे पलई नंबर-एक जैसे गांव पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं। अब ये गांव गैर-चिरागी हो गए हैं। यहां के लोग आसपास के गांवों में बस गए हैं। वहीं 12 से 15 गांव ऐसे भी हैं, जिनकी पुरानी बसावट नदी में बह चुकी है और लोगों ने उसी नाम से दूसरी जगह नई बस्तियां बसा ली हैं।
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कटान की जद में फिर पहुंचे कई गांव
बीते एक दशक में सरयू का रुख तेजी से आबादी की ओर बढ़ा है। कुदरहा ब्लॉक के तटबंध और नदी के बीच बसे मदरहवा, मईपुर, पटपरवा, गंगापुर और महुआपार कला गांव हर साल भीषण कटान झेल रहे हैं। मईपुर और मदरहवा में पिछले तीन वर्षों के दौरान करीब 20 मकान नदी में समा चुके हैं। पिछले वर्ष प्रशासन ने मदरहवा के लोगों को बैड़ारी एहतमाली के ऊंचे स्थान पर बसाने की पहल की थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका। केवल 10 से 12 परिवार ही वहां विस्थापित हो पाए। अधिकांश परिवार आज भी कटान की जद में रहने को मजबूर हैं। ग्रामीण कपिल देव, मेराज अहमद, विजय पाल और सुंदरलाल बताते हैं कि मशीनों से खनन शुरू होने के बाद नदी का रुख तेजी से बदला है। दो दशक पहले नदी गांव से दो-तीन किलोमीटर दूर बहती थी, लेकिन अब गांव से सटकर बह रही है और हर साल कटान बढ़ता जा रहा है।
उधर, दुबौलिया ब्लॉक के मोजपुर, श्रीराम पुरवा, बरदिया लोहार, बानपुर और पूरे मोतीराम के साथ ही विक्रमजोत ब्लॉक के अर्जुनपुर, बघुआपार और पकड़ी संग्राम गांव भी कटान के मुहाने पर पहुंच चुके हैं। इस वर्ष इन गांवों की आबादी तक कटान शुरू हो गई है। लगातार बढ़ते खतरे के बीच ग्रामीण स्थायी पुनर्वास और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।
ग्रामीण बोले-
हमारा गांव इस बार कटान के मुहाने पर आ गया है। आबादी क्षेत्र में कटान भी शुरू हो गई है। हम लोगों के देखते-देखते कई गांव नदी की धारा में विलीन हो चुके हैं। अब उनका नाम सिर्फ कागज में बचा है।
-राम भवन, अर्जुनपुर।
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नदी के किनारे हम लोगों का गांव है। नदी और गांव के बीच रेत के टीले बाढ़ से काफी सुरक्षा करते हैं। लेकिन खनन के चलते नदी के दियारा को छलनी कर दिया जाता है। जिससे नदी की धारा का रूख बदल रहा है। अब हमारा गांव पर भी कटान के चलते खतरा बढ़ गया है।
-छाड़ू, दुधौरा पूरेकुमार।
कोट
बाढ़ खंड की ओर से तटबंधों के सुरक्षा के लिए कार्य योजना तैयार की जाती है। इसके अलावा तटबंध और नदी के बीच बसे बाढ़ प्रभावित गांवों के नागरिकों के लिए सिर्फ पुनर्विस्थापन का ही प्रावधान है। यदि कहीं घनी आबादी हैं तभी बाढ़ से बचाव की कार्य योजना बनाई जा सकती है। 50 या उससे कम घर वाले बाढ़ प्रभावित गांवों के लिए निर्माण की योजना नहीं है। वहां के नागरिकों को सुरक्षित निकालने का ही कार्य किया जाता है।
-दिनेश कुमार, एक्सईएन, बाढ़खंड।