संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी चिकित्सकों के प्राइवेट प्रैक्टिस की प्रथा बंद होना आसान नहीं है। शासन स्तर से भले ही सख्ती बरतने के फरमान जारी हुए हैं, मगर स्थानीय स्तर पर कार्रवाई शुरू नहीं हुई है।
कुछ सरकारी चिकित्सक निजी अस्पताल संचालित करने में मशगूल हैं तो कुछ सरकारी आवास में ही निजी प्रैक्टिस करते देखे जा सकते रहे हैं। मुख्यालय से दूर सीएचसी, पीएचसी पर यह खेल खुलेआम चल रहा है। सल्टौआ की अनीता ने कहा कि उनके यहां सीएचसी स्तर के अस्पताल में तैनात चिकित्सक अपने सरकारी आवास पर बिना फीस लिए मरीजों को नहीं देख रहे हैं।
सरकारी अस्पतालों में तैनात ज्यादातर डाॅक्टरों ने सरकारी आवास को ही क्लीनिक बना रखा है। अस्पताल में पहुंचे या न पहुंचें, मगर आवास पर मरीज जरूर देखते हैं। हर्रैया सीएचसी में मरीज दिखाने पहुंचे प्रवीन ने कहा कि कुछ डॉक्टर अपने सरकारी आवास पर छुट्टी के दिन या ड्यूटी के बाद प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहे हैं।
इसके लिए इनके निजी कर्मचारी भी नियुक्त किए गए हैं। ये मरीजों का फीस जमा कर नंबर लगाया जा रहा है। 10 से 15 मरीजों की संख्या होने के बाद डॉक्टर देखना शुरू कर देते हैं।
कार्रवाई से बचने के लिए मरीजों की दवा सादे पर्चे पर लिखी जाती है। प्रति मरीज 300 से 500 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। एक मरीज के साथ आए गौरव ने बताया कि जिनकी प्रैक्टिस चल गई है, ऐसे डॉक्टर 10 वर्ष से अधिक समय से एक ही जगह पर तैनात हैं।
इसी तरह रुधौली, सल्टौआ, बनकटी और कुदरहा अस्पताल में आने वाले मरीज सुनीता, प्रभाकर, रमेश आदि ने बताया कि सरकारी अस्पताल में तैनात कुछ चिकित्सक अपने आवास पर प्राइवेट प्रैक्टिस करते है।
जिला अस्पताल के सरकारी आवास में भी प्राइवेट प्रैक्टिस का चलन लंबे समय है। बच्चे को दिखाने आए परवेज ने बताया कि पहले वह चिल्ड्रेन वार्ड में गए। पता चला चिकित्सक आवास पर मिलेंगे। वहां पहुंचे तो उनके निजी अस्पताल का पता बताया गया।
उन्होंने कहा कि यहां बाल रोग विशेषज्ञ और कुछ फिजिशियन पहले अपने आवास पर क्लीनिक संचालित करते हैं। जब इनके पास मरीजों की भीड़ होने लगती है तो परिसर से हटकर कहीं निजी व्यवस्था बना लेते हैं।