जिला अस्पताल व कैली में तीस-तीस बेड का पीआईसीयू तैयार
बस्ती। कोरोना काल में दो साल तक मेडिकल कॉलेज का पीडियाट्रिक इटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) बंद रहा। लेकिन, इस बार जापानी बुखार अथवा एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से जंग की तैयारी कॉलेज प्रशासन अभी से शुरू कर दी है। इसके अलावा जिला अस्पताल में जेई/एईएस से जंग की तैयारी है। यहां भी तीस पीआईसीयू के बेड तैयार हैं। जबकि मेडिकल कॉलेज से संबद्ध ओपेक चिकित्सालय कैली में तीस शैय्या युक्त पीआईसीयू को तैयार कर दिया गया है। यहां जेई/एईएस से पीड़ित बच्चों को सुविधापूर्वक इलाज मिलेगा।
वर्ष 2012-13 में मस्तिष्क ज्वर के चलते जिले में करीब दो सौ बच्चे पीड़ित हुए थे। इसमें से कुछ की तो मौत हो गई, मगर कुछ स्वस्थ होकर चले गए। इसके बाद यह सिलसिला लगातार जारी रहा, मगर योगी सरकार ने इस बीमारी पर अंकुश लगाने के लिए टीकाकरण व मच्छरों से निजात के लिए छिड़काव व फागिंग पर जोर दिया। खासकर गांवों में धीरे-धीरे मस्तिष्क ज्वर तो करीब-करीब समाप्त हो गया, मगर एईएस अब भी है। पिछले वर्ष जेई के तीन तो एईएस के पंद्रह बच्चे अस्पतालों में भर्ती हुए थे। चिकित्सकों की मानें तो जेई का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है। एईएस में बच्चों को जेई जैसे लक्षण होते हैं। इसका इलाज भी उन्हीं दवाओं से होता है। बरसात के दिनों में यानी 15 जून से लेकर 30 अगस्त तक इस बीमारी का प्रभाव रहता है।
बोले एसआईसी
जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. आलोक कुमार वर्मा कहते हैं कि जेई/एईएस की संवेदनशीलता के मद्देनजर अस्पताल में तैयारी शुरू की गई है। पंद्रह बेड का पीआईसीयू सक्रिय है जबकि 15 बेड का पीआईसीयू तैयार कर सुरक्षित कर लिया गया है।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जेई/एईएस की संवेदनशीलता को भांप कर तैयारी शुरू कर दी है। वैसे अभी समय है, मगर मेडिकल कॉलेज अपनी तैयारी पूरी कर चुका है। तीस बेड का पीआईसीयू के सभी बेड पर वेंटीलेटर आक्सीजन के अलावा अन्य संसाधनों को भी दुरुस्त करा दिया गया है।
डॉ. मनोज कुमार, प्राचार्य, महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज, बस्ती
छह साल में जेई/एईएस से 558 पीड़ित 52 की हुई मौत
वेक्टर जनित मस्तिष्क ज्वर व एक्यूट इंसेफेलाटिस सिंड्रोम ने जिले में पिछले छह साल में 558 को अपनी चपेट में लिया, जबकि इसी बीमारी से 52 लोग काल के गाल में समा गए। इसमें 48 एईएस से तो चार की मौत जेई से हुई है। इस पर नियंत्रण के लिए तैयारी शुरू हो गई है। इस वर्ष अब तक जेई के एक भी केस नहीं हैं। जबकि एईएस के छह पीड़ितों का इलाज हो चुका है।