बस्ती। जिले में धंधेबाज मुनाफा कमाने के लिए हर तरीका अपना रहे हैं। सहालग में फिर से आलू में खेल शुरू कर दिए हैं। पुराने आलू को केमिकल से नया बना दिया जा रहा, आलू लाल और आकर्षित दिखे इसके लिए रंगा जा रहा है। जिले के छोटे और बड़े मंडी में कारोबारी यह खेल कर रहे हैं। इसके सेवन से स्वास्थ्य बिगड़ सकता है।
सब्जियों में सबका पसंदीदा आलू भी धंधेबाजों की काली नजर की भेंट चढ़कर नुकसानदेह होता जा रहा है। धंधेबाज गेरू और एथिलीन से रंगे पुराने आलू को नया बताकर बेच रहे हैं। अमोनिया और बालू के प्रयोग से भी पुराने आलू को नया बनाया जा रहा है। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि बाजार में बिक रहा करीब 70 फीसदी आलू कलर-केमिकल से रंगा हुआ है, जो सेहत के लिए नुकसानदेह है। डॉक्टरों का कहना है कि इनका अधिक समय तक उपयोग करने पर लिवर संक्रमण के अलावा अल्सर भी हो सकता है।
खाने में कार्बोहाइड्रेट का प्रमुख स्रोत आलू है। सभी घरों में किसी न किसी रूप में हर दिन इसका उपयोग होता है। अकेले हथियागढ़ मंडी में ही करीब 80 से 100 टन आलू की खपत रोज होती है। अगर इसमें ग्रामीण क्षेत्र के बाजारों को भी जोड़ दें तो खपत डेढ़ सौ टन रोजाना तक पहुंच जाती है। लगन के दिनों में डेढ़ गुना खपत और बढ़ जाती है।
जिले और आसपास के जिलों की मिट्टी इसकी खेती के लिए भी उपयोगी है, लेकिन यहां उत्पादन कम होने और फर्रुखाबाद, कन्नौज पर निर्भरता चलते धंधेबाजों को भी मौका मिल गया है। सोनूपार, महादेवा, कंपनीबाग, हर्रैया, बभनान समेत कप्तानगंज बाजार में पुराने आलू को रंगकर व केमिकल के प्रयोग से नया बनाकर बेचने का धंधा चल रहा है। सहालग में इसके आसानी से खपा रहे हैं।
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पुराने आलू को ऐसे बनाते नया
जानकार बताते हैं कि धंधेबाज पुराने आलू को अमोनिया के पाउडर और बालू में मिले मिश्रण में रखकर जूट के बोरे से रगड़ देते हैं। कुछ ही घंटों में आलू का छिलका हट जाता है। उसकी जगह पतली परत से छिलके निकलने लगते हैं। धंधेबाज इसे पहाड़ों से आया सफेद आलू बताकर बेच रहे हैं। नवंबर-दिसंबर में सबसे अधिक बिक्री त्योहार व सहालग के अलावा बुवाई के चलते नवंबर-दिसंबर में आलू की मांग अधिक रहती है। नवंबर में नया आलू भी पंजाब और उत्तराखंड से आता है। इसका फायदा उठाते हुए धंधेवाजों ने अक्तूबर के अंत में ही कोल्ड स्टोरेज से सारा आलू निकाल लिया और उसको रंगकर बाजार में अब तक बेच रहे हैं। एक दिन पहले महादेवा बाजार में पुराने से बनाया गया सफेद आलू पकड़ा भी गया था, अब मंडी में धंधेबाजों ने माल हटा दिया।
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सप्लायर तय करते हैं रेट
पुराने आलू को रंगकर लाल बनाने और केमिकल के इस्तेमाल से नया बनाने का खेल वैसे तो हर बड़ी मंडी में हो रहा है, बताया जा रहा है कि सप्लायर हर दिन जिले से लेकर मंडी तक अपनी सेट की गई दुकानों पर रंगा हुआ या बदला हुआ आलू भिजवाता है। नए आलू का रेट अभी भी थोक में 30 से 35 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि एथिलीन का प्रयोग आमतौर पर आलू को जमने से रोकने के लिए किया जाता है। कोल्ड स्टोरेज में रखने से पहले आलू को इस रासायनिक यौगिक से रंगा जाता है, लेकिन इसका अधिक मात्रा में उपयोग नुकसानदेह होता है।
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एथिलीन से हो सकता अल्सर और कैंसर
धंधेबाज आलू को रंगने के लिए पहले गेरू रंग के पाउडर और फिर एथिलीन का प्रयोग करते हैं। एथिलीन के लंबे समय तक उपयोग से लिवर संक्रमण, पेट में अल्सर और बहुत लंबे समय तक उपयोग से कैंसर का भी खतरा हो सकता है। इसके अलावा एकाग्रता में कमी और मूड स्विंग भी होता है। बताया गया कि आलू धुलने पर भी इसके अवगुण बाहर नहीं निकल पाते। इसके असर से पेट में घाव होने की आशंका अधिक रहती है।
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कार्रवाई की तैयारी में खाद्य सुरक्षा विभाग
पुराने आलू को केमिकल के प्रयोग से नया बनाने और सफेद आलू को लाल आलू बनाकर बेचने का धंधा करने वालों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा विभाग जल्द ही अभियान चलाकर कार्रवाई करेगा। चीफ फूड इंस्पेक्टर अनिल सिंह का कहना है कि टीम मंडी में भ्रमण कर जांच कर रही है। व्यापारी संगठनों से भी अपील की जा रही है कि लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले धंधेबाजों का समर्थन न करें। ऐसे धंधेबाजों की सूचना खाद्य सुरक्षा विभाग को भी दें। सूचना देने वाले का नाम गोपनीय रखते हुए धंधेबाजों पर सख्त कार्रवाई होगी।
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फुटकर में 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा आलू
फुटकर में 30 रुपये किलो। 15 दिन पहले इसकी कीमत 35 रुपये प्रति किलोग्राम थी। पुराने आलू को थोक मंडी में 20 से 22 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बेचा गया था। मंडी से पुराना आलू लगभग गायब ही हो गया है। जो बचा है, वह भी नए रेट के लगभग बराबर बेचा जा रहा है। बताया गया कि हथियागंढ़ मंडी के साथ दक्षिण दरवाजा और कंपनीबाग पर कई धंधेबाज खाद्य सुरक्षा विभाग की नजर में हैं। इनकी निगरानी चल रही है।
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रंगे आलू से सेहत को बेहद नुकसान
जिला अस्पताल के सर्जन डॉ. विजय तिवारी ने बताया कि अगर आलू को रंगने में एसिड या इस जैसे किसी अन्य केमिकल का प्रयोग किया जा रहा है तो यह सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक होगा। इस तरह के आलू के प्रयोग से न केवल लिवर संक्रमण होता है, बल्कि इससे अल्सर का भी खतरा रहता है।