संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी दवाओं की आपूर्ति सवालों से घिर गई है। मरीजों तक पहुंचते-पहुंचते रैपर बंद दवा टैबलेट से बदलकर पाउडर में तब्दील हो जा रही है।गोदामों में भी दवाएं सुरक्षित नहीं हैं। बड़े पैमाने पर भंडारित दवाओं में सीलन के चलते नमी आ जा रही है। बावजूद इसके काउंटरों पर इसकी आपूर्ति की जा रही है। शनिवार को दूसरी बार जिला महिला अस्पताल में सरकारी आपूर्ति की दवा को लेकर बखेड़ा खड़ा हुआ।
यहां दवा काउंटर से वितरित की जा रही रैपर युक्त बी कॉम्प्लेक्स की गोलियां देख मरीज दंग रह गए। उसे छूने से ही उसकी गुणवत्ता को संदेह जताने लगे। कुछ मरीजों ने रैपर फाड़कर गोलियां देखनी शुरू की तो उसके अंदर टैबलेट की जगह रंगीन पाउडर था।
इसके बाद मरीज दवा काउंटर पर वापस करने पहुंच गए। विभाग से जुड़े जानकार बताते हैं कि सरकारी आपूर्ति की दवाओं में लंबा झोल है। नॉट फार सेल की मुहर लगी इन दवाओं का रैपर बाहर की दवाओं के रैपर से दिखने में अलग लगती है। बाजार में बिकने वाली दवाओं के रैपर के मुताबिक सरकारी आपूर्ति के दवा का रैपर गुणवत्तापरक नहीं देखा जाता है।
अस्पताल में मौजूद मरीज प्रियंका ने बताया कि सरकारी आपूर्ति की दवा तीन-चार डोज लेने के बाद ही असर करती है। जबकि उसी फार्मूले की ब्रांडेड दवाएं लेकर खाने पर एक-दो खुराक में असर दिखाने लगता है। शहर के रहने वाले प्रभात कुमार ने बताया कि जब भी सरकारी अस्पताल में दिखाते हैं तो दवा बाहर से खरीदते हैं।