नगर बाजार(बस्ती)। समय के साथ होली मनाने का तौर तरीका भी बदल गया है। भतरिन्हाजोत निवासी शिवयज्ञ दुबे ने बचपन की याद ताजा करते हुए बताया कि सामूहिक उत्साह और उल्लास के प्रतीक इस त्योहार को आधुनिकता की ऐसी नजर लगी कि मिट्टी की सौंधी महक वाले फाग और फगुआ कहां खो गए, पता नहीं।
होली का त्योहार प्रेम की वह रसधारा है, जिसके रास्ते रास रंग के जरिये पूरा समाज सरोबार हो जाता था। कानों में ढोल, ताशा, मजीरा और डफली की वह गूंज अब बहुत कम सुनने को मिलती है। हां, कहीं कहीं गांवों में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक होली को आज भी राग-रंग, हंसी-ठिठोली, लय, आनंद और राग रंग के साथ रास रंग के नजरिये से देखते हैं।
जगदंबा प्रसाद ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवरात्रि के दिन से ही होली की शुरुआत मानी जाती थी और इसी के साथ होली की मस्ती शुरू हो जाती थी। पहले गांवों में फागुनी गीत गाए जाते थे जो होली के बाद तक चलते थे, लेकिन अब सिर्फ ठेठ ग्रामीण इलाकों में होली के दिन शाम में होली के पास जाकर फाग गाई जाती है। मोबाइल में व्यस्त रहने वाली नई पीढ़ी फाग गायन, ढोलक वादन ना सीखने के कारण वह परंपरा भी लुप्त होते नजर आ रही है।
राम दुलारे गौड़ बताते हैं कि पहले होली के त्योहार में गाए जाने वाली फागों में देवी-देवताओं को समर्पित गीत एवं पवित्र हंसी-मजाक की फाग भी शामिल होती थी, लेकिन अब उनकी जगह फूहड़ और अश्लील गाने सुनने को मिल रहे। सवारी वाहनों, जीप, टेंपो और लग्जरी गाड़ियों में फूहड़ गानों की भरमार हो गई। डीजे के चलन से सब खत्म हो गया।