जनकपुर से अयोध्या जाते समय पैर में चने की खूंटी चुभने से हुई थीं नाराज
अमर उजाला ब्यूरो
विक्रमजोत(बस्ती)। मनोरमा और सरयू नदी के बीच के भूभाग में स्थित हर्रैया तहसील के करीब 700 गांवों में चने की खेती नहीं की जाती। जबकि कृषि विज्ञानियों के अनुसार, यह क्षेत्र चने की खेती के लिए उपयुक्त है। किंवदंती है कि माता सीता के श्राप के कारण क्षेत्र के लोग त्रेतायुग से ही चने की खेती नहीं करते हैं।
विक्रमजोत ब्लॉक क्षेत्र के मल्हूपुर अमोढ़ा निवासी पं. अनिरुद्ध मिश्रा बताते हैं कि इस क्षेत्र में त्रेतायुग से ही चने की खेती नहीं होती है। किंवदंती है कि प्रभु श्रीराम जनकपुर से माता सीता को लेकर अयोध्या लौट रहे थे। रास्ते में खेत मिला। जिसमें चने की फसल काटी गई थी। इसकी खूंटियां माता सीता के पैरों में चुभ गईं। इससे नाराज होकर माता ने श्राप दिया कि यदि इस क्षेत्र में कोई चने की फसल की बुआई करेगा तो उसका अनिष्ट हो जाएगा। तभी से यहां चने की खेती नहीं की गई। यदि कोई परंपरा को तोड़कर ऐसा करता है तो उसे हानि होती है।
नेतवर गांव निवासी शिक्षक ओम प्रकाश तिवारी बताते हैं कि सरयू नदी के उत्तर व मनोरमा नदी के दक्षिण के किसान चने की खेती नहीं करते हैं। इस भू-भाग में विक्रमजोत, दुबौलिया, परशुरामपुर व कप्तानगंज ब्लॉक का कुछ हिस्सा आता है। कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया के वैज्ञानिक डॉ. आरवी सिंह बताते हैं कि इन गांवों की मिट्टी चने की खेती के लिए उपयुक्त है। काफी प्रयास किया गया लेकिन लोग पूर्व की परंपरा को तोड़ना नहीं चाहते हैं।
धनतेरस के दिन कनक भवन में अर्जी देकर कर सकते हैं खेती
विक्रमजोत ब्लॉक के गोरसरा-तिवारी निवासी अशोक पांडेय और दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि श्राप के बाद लोगों ने माता सीता से गुहार लगाई की मैया विकल्प सुझाएं, तो माता ने कहा कि धनतेरस के दिन चने की बुआई की इजाजत मिलेगी। ऐसे करने से किसान अनिष्ट होने से बच सकते हैं। इसी मान्यता के कारण आज भी धनतेरस के दिन अयोध्या स्थित कनक भवन में माता सीता के दरबार में इजाजत के लिए भारी भीड़ होती है।