बस्ती। दुबौलिया विकास खंड का सुबिका बाबू गांव साल दर साल बाढ़ की विभीषिका झेलने के लिए अभिशप्त है। सरयू नदी और तटबंध के बीच बसे इस गांव का काया पलट अमृत काल में भी नहीं हो सका है। आवागमन के लिए एक सुलभ रास्ता तक नहीं है।
ग्रामीण रोजाना पगडंडी से होकर स्कूल, बाजार, अस्पताल पहुंचते हैं। यहां के लोगों की आठ महीने तो किसी तरह गुजर बसर हो जाती है लेकिन, बाढ़ के समय घर-गृहस्थी अपने हाथों ही उजाड़नी पड़ती है। सरयू की जलधारा उफान पर होने के दौरान ग्रामीण चार महीने तक शरणार्थी बनकर गुजारा करते हैं।
बता दें कि सुबिका बाबू गांव दुबौलिया ब्लॉक के कटरिया-चांदपुर तटबंध से एक किमी की दूरी पर स्थित है। इस गांव के बगल सरयू नदी की सोती है। जबकि मुख्य धारा 500 मीटर की दूरी पर है। तटबंध और नदी के बीच बसा यह गांव बाढ़ के समय चौतरफा पानी से घिर जाता है। पगडंडी की राह से लेकर खेत-खलिहान तक पानी में डूबे रहते हैं।
इतनी दुश्वारियां नदी के चेतावनी बिंदु पर पहुंचते ही शुरू हो जाती है। इसके बाद भी ग्रामीण अपना आशियाना नहीं छोड़ते हैं। साग-भाजी, दवा एवं शिक्षा के लिए यहां के नागरिक नाव के सहारे कटरिया- चांदपुर तटबंध पर आते-जाते हैं।
जैसे ही नदी का दायरा बढ़कर लाल निशान तक पहुंचता है बाढ़ की त्रासदी से यहां के ग्रामीणों में भगदड़ मच जाती है। लोग घर-गृहस्थी का सामान बांधकर तटबंध की ओर रूख कर देते हैं। ग्रामीण अपने मवेशियों को भी साथ ले आते हैं। बंधे पर ही पन्नी आदि तानकर इनका गुजर बसर काफी दिनों तक होता है।
बाढ़ की विभीषिका के दौरान बच्चों की पढ़ाई बाधित रहती है, खेती-किसानी भी चौपट हो जाता है। ग्रामीणों के अनुसार बाढ़ की वजह से वह एक ही फसल काट पाते हैं। दूसरी फसल पानी में डूबकर बर्बाद हो जाती है।
50 घर वाले इस गांव की कुल आबादी 350 है। इसमें ज्यादातर फूस और मिट्टी के कच्चे मकान हैं। लगातार बारिश और बाढ़ का पानी भरने से मकान भी गिरकर धराशायी हो जाते हैं। बाढ़ के लौटने पर लोग फूस का इंतजाम कर फिर से रहने के लिए घर बनाते हैं।
अधिकतर परिवार की आमदनी का स्रोत केवल मजदूरी है। मुफलिसी और बेबसी इस कदर कि यहां के लोग सुरक्षित ठिकानों पर जमीन खरीदकर नया आशियाना नहीं बना पा रहे हैं। गांव तक दो पहिया, चार पहिया वाहन पहुंचने के लिए एक सड़क भी नहीं है।