ऊपर वाला न करे कि किसी को हार्ट अटैक हो मगर अपने जिले में किसी को ऐसा हो गया तो तय मानिए कि कोई न कोई अनहोनी हो जाएगी। क्योंकि मंडल मुख्यालय पर स्थित सरकारी अस्पतालों में हृदय रोग इलाज के लिए कोई विशेषज्ञ डॉक्टर हैं ही नहीं। हां, संसाधनों की कोई कमी नहीं है मगर उसे संचालित करने वाले हाथों का वर्षों से अस्पताल इंतजार कर रहे हैं।
बात शुरू करते हैं जिला अस्पताल से। हृदय रोग विभाग का यहां भवन है। इसके अलावा अत्याधुनिक टीएमटी, ईसीसी मशीन भी है। इसे चलाने के लिए एक प्रशिक्षित तकनीशियन की भी तैनाती है, मगर जिसकी जरूरत सबसे अधिक है वह है डॉक्टर जो यहां हैं ही नहीं। वर्ष 2000 तक यहां डॉ. वीपी सिंह की तैनाती थी मगर उनका स्थानांतरण पदोन्नति के बाद लखनऊ हो गया। इसके बाद यहां किसी की तैनाती नहीं हो सकी। हृदय रोग विभाग का भवन खड़ा है। इसमें डॉक्टर भी बैठते हैं मगर वे हृदय रोग से संबंधित नहीं हैं।
ओपेक चिकित्सालय कैली में तो हृदय रोग के लिए इंसेंटिव क्रिटिकल केयर यूनिट स्थापित है। दस शैय्या इस वार्ड वेंटीलेटर, सेंट्रल ऑक्सीजन सिस्टम, टीएमटी, ईसीजी सिस्टम के अलावा शरीर में मौजूद ऑक्सीजन व हार्ट संचलन की जानकारी के लिए मॉनीटर व अन्य सिस्टम भी है, मगर बीस वर्ष से इस यूनिट पर ताला लटक रहा है। बंद मशीनें कमरों की शोभा बढ़ा रही हैं। हालांकि, वर्ष 2004 में शासन ने एक हृदयरोग विशेषज्ञ की तैनाती की थी, मगर वे यहां ज्वाइन तक करने नहीं आए। ऐसे में ओपेक चिकित्सालय कैली का यह वार्ड खुलने से रह गया। यह अलग बात है कि हृदय रोग के हल्के-फुल्के झटके को फिजीशियन संभालते हैं, मगर स्थिति बिगड़ते ही वह भी रेफर का सहारा लेकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
हर दिन औसतन दस रोगी
शहर के हृदय रोग के निजी अस्पताल के डॉ. डीके गुप्त कहते हैं कि ठंड में हृदय रोग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। हर दिन औसतन दस मरीज आते हैं।
शासन को लिखे कई पत्र
ओपेक चिकित्सालय कैली के निदेशक डॉ अरुण कुमार कहते हैं कि हृदय रोग विशेषज्ञ ही नहीं यहां अन्य विभागों के लिए डॉक्टर की मांग कई बार की गई है, मगर कुछ नहीं हो सका। यह सही है कि हृदयरोग विभाग पर ताला लटक रहा है। बगैर डॉक्टर इस विभाग का संचलन संभव नहीं है।
जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. एके श्रीवास्तव कहते हैं कि हृदय रोग विभाग का भवन डॉक्टर न होने के कारण खाली था। ऐसे में वहां अब मानसिक रोग के डॉक्टरों को बैठाया जा रहा है। जो मशीनें हैं उनको सुरक्षित रख दिया गया है। कभी-कभार ईसीजी मशीन संचालित होती है। वैसे फिजीशियन हृदय रोग के मरीजों को प्राथमिक उपचार दे देते हैं मगर गंभीर स्थिति में उन्हें रेफर करना मजबूरी है। शासन से इस बारे में कई पत्राचार किए गए हैं।