संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। लहसुन के धंधेबाजों को देसी-विदेशी का खेल खेलने की गुंजाइश इसलिए बनी हुई है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर इसका उत्पादन बेहद कम है।
अनुकूल जलवायु और मिट्टी होने के बावजूद यहां के किसान इसकी खेती करने से भागते हैं। इसकी बड़ी वजह जमाखोरों की कुत्सित चाल बताई जा रही है।
आलू की तरह स्थानीय स्तर पर ज्यादा उपज हो जाने पर किसान को कई बार रेट नहीं मिल पाता। किसान कहते हैं कि इसमें रिस्क है।
लहसुन की मांग पूरी तरह से बाहर की मंडियों पर आश्रित है। जिले में सामान्य सीजन में दो से तीन टन की खपत है।
सहालग या त्योहारों में यह बढ़कर पांच टन तक पहुंच जाती है। बाहर की मंडियों से मंगाने के चक्कर में व्यापारी चीन का लहसुन भी मंगाते हैं।
देखने में सुडौल और देसी के मुकाबले सस्ता होने की वजह से लोग चीन वाला लहसुन ज्यादा पसंद करने लगे थे। हालांकि, इसके नुकसान को जानने के बाद लोगों का नजरिया बदल रहा है। बहादुरपुर ब्लॉक के प्रतापपुर निवासी किसान इंद्रजीत सिंह बताते हैं कि कुछ साल पहले वह एक एकड़ में लहसुन की खेती करते थे। अच्छा उत्पादन हुआ।
मगर, बेचने की बारी आई तो 15 रुपये किलो रेट पहुंच गया। ऐसे में लागत निकालना मुश्किल हो गया था। तब से केवल अपने इस्तेमाल भर की इसकी खेती करने लगे। नरायनपुर के किसान बाबूराम बताते हैं कि इसमें लेबर खर्च ज्यादा लगता है। निराई-गुड़ाई कई बार करना पड़ता है। हालांकि, इसमें कोई खास बीमारी नहीं लगती।
सब कुछ अनुकूल, सिर्फ पहल की जरूरत : जिला उद्यान अधिकारी अरुण कुमार त्रिपाठी के मुताबिक, बस्ती जिले की जलवायु और मिट्टी लहसुन की खेती के लिए काफी अनुकूल है।
यहां ढंग से इसकी खेती की जाए तो अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है। साथ ही, इसकी आसमान पर पहुंची महंगाई को काफी हद तक रोका जा सकता है। यहां सिर्फ किसानों में इसकी व्यवसायिक खेती की पहल करने भर की जरूरत है। .. े