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अगिया रोग से डूब रही है किसानों की पूंजी, मदद की गुहार

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अगिया रोग से डूब रही किसानों की पूंजी
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बस्ती/बहादुरपुर। जिले के अधिकांश किसान पारंपरिक खेती को तरजीह देते हैं। इसकी वजह कम लागत में अधिक फायदा बताया जा रहा है, लेकिन पिछले दो साल से फसल में रोग-व्याधि अधिक लग रहे हैं। इससे लागत तो बढ़ रही है, लेकिन मुनाफा कम हो रहा है। ऐसे में धान और गेहूं की खेती करने वाले किसान ऊहापोह की स्थिति में हैं।
किसान राम गोपाल दुबे ने बताया कि इस बार बारिश खूब होने से धान की फसल का विकास तेजी से हुआ, लेकिन फसल को अगिया से नहीं बचा पाया। वैज्ञानिक बताते हैं कि इस रोग को पूर्णतया खत्म नहीं किया जा सकता। लागत लगातार बढ़ती जा रही है। बाबूराम बताते हैं कि वह धान और गेहूं की खेती करते हैं। बारिश के कारण धान की फसल काफी अच्छी थी, लेकिन अगिया रोग की वजह से सब चौपट हो गया। अगिया लगी फसल कोई नहीं खरीदता। अब रबी सीजन की लागत कहां से लाएं यह चिंता सता रही है। किसान रमेश चंद्र का कहना है कि पिछले दो साल से फसलों में रोग-व्याधि अधिक लग रहे हैं। अब कृषि रक्षा इकाइयों से रसायन भी नहीं मिलता। ऐसे में लागत बढ़ रही है और लाभ कम हो रहा है। किसान हरिहर बताते हैं कि इस बार फसल अच्छी हुई थी, लेकिन अगिया ने सब खराब कर दिया। भर्ती निकल जाए तो बड़ी बात है। किसान राजमणि, रामदास, सुदामा, संतराम, हरिश्चंद्र, रामअचल, ओम प्रकाश, प्रदीप आदि ने बताया कि पहले से ही कर्ज में डूबे हैं, ऊपर से धान की फसल भी खराब हो गई। उम्मीदों पर अगिया ने पानी फेर दिया।
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‘रोग पर पाया जा सकता है नियंत्रण’
जिले में एक लाख सात हजार 185 हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती की जा रही है। कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. प्रेमशंकर का कहना है कि अगिया रोग को पूर्णतया खत्म नहीं किया जा सकता, पर नियंत्रण संभव है। किसान अगिया ग्रसित पौधों को सुबह के समय सावधानी पूर्वक खेत से निकालकर मिट्टी के नीचे दबा दें। इसके बाद नियंत्रण के लिए प्रॉपिकॉनाजोल दवा 200 मिली इतने ही पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। यह क्रम 15 दिन के बाद तब तक दोहराते रहें जब तक फसल पककर तैयार न हो जाए।
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