संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सर्दी के मौसम में पुरबिया भोजन में शुमार सरपहिता की दाल का खास महत्व है। यह हींग के छौंके में उड़द और बथुआ मिलाकर बनाया जाता है। इसलिए ठंड में खड़ा उड़द अथवा इसकी दाल की मांग बढ़ जाती है। मगर, खरीदने से पहले इसे परख लीजिए, वरना धोखा खा जाएंगे।
बाजार में जिसे काली और हरे रंग की उड़द समझ रहे हैं, दसअसल वह साबुत मूंग है और वह भी रंगी हुई। परखने में चूक हुई तो आपके झोले में उड़द की जगह रंगी हुई मूंग घर पहुंच जाएगी। अरहर और मसूर की दाल भी पॉलिश कर रंगी हुई बेची जा रही है।
इसका सेवन सेहतमंद बनाने की जगह बीमार बना सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, रंगी हुई दाल खाने से लीवर को बहुत नुकसान पहुंचता है।
मिलावट के इस खेल में प्रयागराज, गोरखपुर और कानपुर के धंधेबाजों का नेटवर्क बनाया हुआ है और उन्हीं के माध्यम से बस्ती की थोक मंडी में मिलावट वाली दाल का धंधा जोरों पर चल रहा है।
जानकारों की मानें तो बस्ती की थोक मंडी में रोज करीब पांच से छह ट्रक (लगभग 150 से 180 टन) दाल की खपत है। जबकि स्थानीय स्तर पर इसक उत्पादन 10 फीसदी भी नहीं है। अब पूर्वांचल में बोवाई खत्म होने के बाद अब दाल की निर्भरता पूरी तरह से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर है।
इसी का फायदा धंधेबाजों ने उठाया है और प्रयागराज, कानपुर और लखनऊ में अड्डा बना लिया है। वे राजस्थान से सस्ते दर पर हल्की और खड़ी फसल खरीदकर लाते हैं और वहां इनकी छिलाई व रंगाई कर नए पैकेट में डाल देते हैं।
धंधेबाज साबुत मूंग को रंगकर साबुत उड़द बना देते हैं। दाल हर घर में खाई जाती है। इसके अलावा बेसन, नमकीन बनाने में इसका उपयोग होता है। बढ़ती मांग को देखते हुए धंधेबाजों ने इसमें खेल शुरू कर दिया है।
व्यापारी बताते हैं कि पहले कानपुर से दाल आती थी। मगर, नया बाजार मध्य प्रदेश के कटनी, इंदौर, जबलपुर इलाके में बन गया है। यूपी में प्रयागराज इसका बड़ा केंद्र है। राजस्थान-मध्य प्रदेश से सस्ते दाम पर खरीदी गई साबुत मूंग को छोटे-छोटे मिलर को भेजकर उनकी छंटाई कराई जाती है। फिर इसे रंगकर उड़द की दाल बना देते हैं। इसी तरह से अरहर की खराब गुणवत्ता वाली दाल को भी रंगकर फूल वाली (पॉलिस वाली) दाल के नाम से बेच रहे हैं।