- याचिका में कमिश्नर व डीएम के भी नाम, मदरसा ध्वस्तीकरण मामले में प्रबंधन ने हाईकोर्ट में दायर की है याचिका
- कोर्ट के आदेश के बाद रुका है मदरसा ध्वस्तीकरण का काम
संतकबीरनगर। मदरसा ध्वस्तीकरण मामले में ब्रिटिश मौलाना शमशुल हुदा खान ने अफसरों पर एक बार फिर कानूनी फंदा फेंका है। हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में कमिश्वनर, जिलाधिकारी, एसपी सहित कई लोगों के नाम हैं। इस याचिका के बाद कोर्ट के आदेश पर मदरसा ध्वस्तीकरण का काम 27 अप्रैल से ही रोक दिया गया है। खलीलाबाद के मोतीनगर स्थित मदरसा मामले में बस्ती कमिश्नर कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रशासन ने 26 अप्रैल को मदरसा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की। यह काम 27 की दोपहर करीब 12 बजे तक चला। इस बीच हाईकोर्ट द्वारा मदरसा ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने के आदेश के बाद इस काम को रोक दिया गया। इससे पहले मदरसे को ध्वस्त करने के लिए अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया था और एहतियात बरतने के निर्देश दिए थे।
मदरसा ध्वस्तीकरण के एसडीएम कोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रबंधतंत्र ने डीएम कोर्ट में अपील और कमिश्नर कोर्ट में निगरानी याचिका दायर किया था। मामले में सुनवाई तेज करने के लिए हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की गई। कमिश्नर कोर्ट ने एसडीएम और डीएम के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद मदरसा ध्वस्तीकरण का काम शुरू होने पर मदरसा प्रबंधन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। इसके आदेश के बाद काम रोक दिया गया।
याचिका में इनके हैं नाम
स्टेट ऑफ यूपी व चार अन्य
कमिश्नर बस्ती
जिलाधिकारी
एसपी
एसडीएम
यह है मामला
खलीलाबाद शहर के मोतीनगर स्थित जमीन के गाटा संख्या 154 की 640 वर्गमीटर भूमि पर मदरसा निर्माण हुआ है। सोसाइटी की ओर से वर्ष 2018 में भवन मानचित्र स्वीकृति के लिए आवेदन किया गया था। आरोप था कि नियत प्राधिकारी द्वारा समय पर कोई निर्णय न देने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया, जिसे बाद में अवैध बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया गया। कमिश्नर कोर्ट में सोसाइटी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि मानचित्र नियमों के तहत स्वतः स्वीकृत माना जाना चाहिए था और संबंधित अधिकारियों ने बिना पूरी सुनवाई के कार्रवाई की। वहीं सरकारी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि विवादित भूमि पहले ही राजस्व संहिता के तहत राज्य सरकार में निहित हो चुकी है। ऐसे में मानचित्र स्वीकृति का आवेदन निरस्त करना पूरी तरह उचित है। बस्ती मंडल आयुक्त ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पाया कि नियत प्राधिकारी, एसडीएम और जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेशों में कोई कानूनी या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है। आयुक्त ने निगरानी याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया था।