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Basti News: बारिश का पानी सहेजने की फिक्र नहीं, हर साल होती बर्बादी

Mon, 19 Aug 2024 10:57 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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बर्बाद हो रहा बारिश का पानी, नक्शा पास भवनों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग नहीं
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डीएम व मंडलायुक्त कार्यालय भवन के अलावा अन्य कहीं नहीं हार्वेस्टिंग सिस्टम
भवनों के नक्शे पास करने तक सिमट कर रह गई बीडीए की कार्रवाई
ग्राम पंचायतों के अमृत सरोवरों पर पानी संरक्षण का सारा दारोमदार

संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। आसमान से अमृत बरस रहा है। मगर, सहेजने के इंतजाम नहीं हैं। यह नाले-नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है। बीडीए सिर्फ भवनों के नक्शे पास करने की कार्रवाई कर रहा है। इसे लेकर शायद ही कभी सख्ती बरती गई हो। बारिश का पानी संरक्षण का सारा दारोमदार ग्राम पंचायतों में बने अमृत सरोवरों पर है। यह अलग बात है कि अमृत सरोवर भी किसी काम के साबित नहीं हो रहे हैं।
शहर में गांधीनगर, रोडवेज, पचपेड़िया, पुरानी बस्ती आदि जगहों पर अब पानी 80-100 फीट पर निकल रहा है। इससे पानी के लिए बोरिंग कराने वालों की लागत बढ़ गई है। 2022 में जिले का भू-जल स्तर 6.02 एमबीजीएल (मीटर बिलो ग्राउंड वाटर लेबल) था, जो अब और नीचे खिसक गया है। इस वर्ष भू-जल स्तर 6.32 एमबीजीएल पर पहुंच गया है।
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यह प्रतिवर्ष करीब 30 सेंटीमीटर यानी एक फीट भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। हाल ही में पानी के लिए बोरिंग कराने वाले पचपेड़िया के मनोज बताते हैं कि 100 फीट तक पानी पीने लायक नहीं निकल रहा है। शुद्ध पेयजल के लिए कम से कम 200 फीट तक बोरिंग करानी पड़ रही है। पहले बोरिंग कराने में चार से पांच हजार रुपये खर्च आते थे। अब 35-50 हजार रुपये तक खर्च हो रहे हैं।

भू-गर्भ जल के दोहन का असर शहर में दिखने लगा है। यदि भूगर्भ जल को रिचार्ज करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब शहरवासियों को शुद्ध पेयजल के लिए तरसना पड़ सकता है।
सरकार ने भूगर्भ जलस्तर में सुधार के लिए वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली को लागू करने की नीति बनाई है। मगर, यह नीति फाइलों में दबकर रह गई है। हालात यह है कि सरकारी सिस्टम भी इसके प्रति उदासीन हैं। नियमानुसार, बारिश के पानी को बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम सभी सरकारी भवनों में होना चाहिए। मगर, मंडलायुक्त व जिलाधिकारी कार्यालय को छोड़ दिया जाए तो अन्य किसी कार्यालय भवन में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं बन पाया है। ऊपर से शहर में ज्यादातर वेटलैंड (आर्द्रभूमि) पर कब्जा हो चुका है। कभी लबालब पानी से भरे रहने वाले पांडेय पोखरा, लेबुड़वा ताल अब सिर्फ अभिलेख में ही बचे हैं। ज्यादातर को पाटकर निर्माण करा लिया गया है।

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बीडीए कार्यालय भी सिस्टम से लैस नहीं
शहर में निर्माण कार्य कराने के लिए बीडीए से अनुमति लेनी अनिवार्य है। जो ऐसे नहीं करता है उसके खिलाफ बीडीए कार्रवाई शुरू कर देता है। मगर, बीडीए कार्यालय भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से लैस नहीं है। शायद यही वजह है कि व्यावसायिक व अन्य बड़े भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है।
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300 वर्गमीटर के मकानों में अनिवार्य

रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की बात की जाए तो शहर में इसका चलन ही नहीं दिखता है। चाहे पुराने भवन हों या नए बन रहे हों, कहीं भी हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं बना है। जबकि नियमानुसार, कम से कम 300 वर्ग मीटर के मकानों में इस सिस्टम का होना अनिवार्य है। आवासीय के साथ-साथ व्यावसायिक इमारतों में भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम होना जरूरी है। यदि बारिश का पानी सहेजा जाता तो जाहिर सी बात है कि जिले का भूगर्भ जलस्तर एक फीट प्रतिवर्ष की दर से नीचे नहीं गिरता।
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