शरद पूर्णिमा की चंचल किरणों की छटा के बीच रविवार/सोमवार की रात्रि दुर्गापूजा समारोह का समापन हुआ। संध्या से शुरू हुआ विसर्जन का सिलसिला कडे़ सुरक्षा व्यवस्था के बीच सोमवार सुबह तक चलता रहा। जगह-जगह मेले लगे, जहां शहरी व गवंई संस्कृति का अनूठा समागम देखने को मिला। संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था काफी चौकस रही।
रविवार को सुबह से ही पंडालों में विसर्जन की तैयारी शुरू हो गई। आकर्षक ढंग से सजाए गए ट्रक, ट्रैक्टर-ट्राली, डीसीएम आदि पर वाहनों पर प्रतिमाएं रखकर घाट तक ले जाई गईं। पुरानी बस्ती क्षेत्र की प्रतिमाएं करुआ बाबा के स्थान के पास एकत्र हुईं। वहां से जुलूस की शक्ल में पांडेय बाजार, दक्षिण दरवाजा, पक्का बाजार, गांधीनगर, कंपनी बाग होते अमहट पर पहुंचाई गईं। जुलूस के दौरान डीजे की धुनों पर लोग नाचते-गाते चल रहे थे।
परशुरामपुर क्षेत्र के विभिन्न बाजारों व गांवों में स्थापित 38 दुर्गा प्रतिमाओं का सरयू तट पर विसर्जन किया गया। जिसमें चौरीबाजार, नन्द नगर
,सिकन्दरपुर, रिधौरा, जमौलिया आदि स्थानो से गाजे बाजे के साथ प्रतिमाओं को नदी तट पर ले जाया गया,जहां विसर्जन किया गया। संवेदनशील और सांप्रदायिक क्षेत्रों में खास इंतजाम किए गए थे। बड़ी संख्या में बाहरी फोर्स और पीएसी के जवानों की मौजूदगी में मूर्तियों का विसर्जन कराया गया। अमहट घाट पर करीब दो सौ प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। पुरानी बस्ती, कोतवाली, वाल्टरगंज और नगर थानाक्षेत्र की कुछ प्रतिमाओं का विसर्जन भी अमहट घाट पर किया गया। ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिमाओं का विसर्जन नजदीक की नदी में किया गया।
रविवार की रात शहर में भारी भीड़ रही। मेले का अंतिम दिन होने की वजह से काफी लोगों ने दर्शन पूजन किया। मेले के दौरान महिलाओं ने जमकर खरीददारी भी की। कचहरी चौराहे से लेकर पांडेय बाजार तक रोड पर लोग दिखाई दे रहे थे। गांधीनगर से लेकर कंपनी बाग तक पैदल चलना मुश्किल था।