दमा रोगियों को महसूस हो रही घुटन, ह्दय रोगियों का भी दिल धड़का
दिवाली में धुआं हो गए डेढ़ सौ क्विंटल बारूद से बने पटाखे, वायुमंडल प्रदूषित
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। दिवाली की धूम में वायुमंडल को सुरक्षित रखने की चिंता किसी को नहीं रह गई। खुशियों की खुमार ऐसी चढ़ी कि तीन दिनों तक आसमान में आतिशबाजी की सतरंगी छटा छंटने का नाम नहीं लिया। लगभग डेढ़ सौ क्विंटल बारूद से बने पटाखे धुआं हो गए। इनके घुलने से हवा भी जहरीली हो गई। वर्तमान में एक्यूआई 180 पर पहुंच गया है। बीमार लोगों को खुले में सांस लेने पर घुटन महसूस हो रही है। दिवाली और परेवा की रात पटाखों के शोर में ह्दय रोगियों की धड़कनें बढ़ी रहीं। दमा रोगियों को भी सांस लेनेे में कठिनाई हो रही है।
प्रदूषण पर अंकुश के लिए कम पटाखे जलाने की सीख धरी की धरी रह गई। दिवाली की शाम होते ही आसमान सतरंगी रॉकेट से पट गए। गली-मोहल्लों में रंग-बिरंगी फुलझड़ियां जलाई जाने लगीं। पटाखे जलने का सिलसिला पूरी रात चलता रहा। परेवा के दिन शुक्रवार को भी खूब पटाखे फोड़े गए। एक अनुमान के मुताबिक बुधवार से शुक्रवार तक दस करोड़ रुपये से अधिक कीमत के पटाखे जला दिए गए।
करीब डेढ़ सौ क्विंटल बारूद का धुआं हवा में घुल चुका है। इस वजह से शुक्रवार और शनिवार को सुबह सांस के रोगियों को दिक्कत महसूस हुई। तीन दिन में शहर का एक्यूआई 140 से बढ़कर 180 पर पहुंच गया है। ऊपर से खेतों में पराली जलाने से पर्यावरण को और खतरा पहुंचने की आशंका है। शहर में धूल के कण और वाहनों से निकले धुएं से दशहरा के बाद से ही प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है।
लगातार 100 के आसपास रहने वाला एक्यूआई का स्तर 140 के पार तक पहुंचा हुआ था। मगर, इस सप्ताह बुधवार से इसमें इजाफा होने लगा। शनिवार को एक्यूआई 180 पर पहुंच गया। जानकार बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में एयर क्वालिटी इंडेक्स इतने ऊपर कभी नहीं पहुंचा था। 2019 में 165 तक एक्यूआई पहुंचा था। पर्यावरण के जानकार अजीत कुमार ने बताया कि बारूद के द्वारा पर्यावरण में सूक्ष्म कणों की मात्रा ज्यादा हो जाती है और हानिकारक प्रदूषक जैसे की नाइट्रेट्स, सल्फर ऑक्साइडस, क्लोराइडूस, अमोनिया के जल में घुलनशील तत्व उत्पन्न होते है। साथ ही विभिन्न धातु जैसे की मैग्नीशियम, क्रोमियम, कैल्शियम, बेरियम जो की कैंसर जैसे रोगों के कारण होते हैं ये भी हानिकारक मात्रा में बढ़ जाती है। जल में घुलन शील होने के कारण इनका दीर्घ काल तक प्रभाव बना रहता है।
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बढ़ गए एलर्जी, अस्थमा के मरीज
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. रामजी सोनी के मुताबिक दीपावली के बाद हर वर्ष की तरह इस बार भी एलर्जी, अस्थमा के मरीज बढ़ गए हैं। असल में पटाखे जलाने पर उनसे गंधक और पोटेशियम नाइट्रेट समेत कई हानिकारक गैस निकलती है। एक साथ चारों तरफ इन गैसों की मात्रा बढ़ने से एयर क्वालिटी इंडेक्स बढ़ जाता है। जहरीली गैसों के चलते सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। सबसे अधिक परेशानी एलर्जी व अस्थमा मरीजों को होती है। शोर और प्रदूषण से तनाव होता है, जो ब्लड प्रेशर और शुगर के अलावा हृदय रोगियों के लिए हानिकारक है। अचानक तेज आवाज के पटाखे बजने पर ह्दय रोगियों को जो झटका लगा है, इससे उनकी तबीयत बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है।
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क्या करें अस्थमा रोगी
- दीपावली के बाद चार-पांच दिन तक सुबह टहलने से बचे।
- शाम के बाद घर से निकले तो गर्म कपड़े पहने।
- अचानक तापमान बदलने के दौरान पहनावे में सावधानी बरतें।
- सुबह-शाम भांप जरूर लें, गर्म पानी का सेवन करें।
- गर्म भोजन करें, सलाद और फल का अधिक सेवन करें।
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पराली प्रबंधन न होने से अभी और खतरा
धान की फसल की कटाई शुरू हो चुकी हैं। मजदूरों से फसल कटाना महंगा पड़ रहा है और समय भी ज्यादा लग रहा है। मजूदरों की कमी भी है। ऐसे में कंबाइन मशीनों से खेतों को फसल से खाली किया जा रहा है। मगर, पराली के प्रबंधन का इंतजाम अधिकांश जगहों पर
नहीं हैं। खेतों में फसल का अपशिष्ट छोड़ दिया जा रहा है। दो दिन धूप खाने के बाद उसे रात के समय आग के हवाले कर दिया जा रहा है। यह नजारा सड़कों से रात में हर तरफ देखने को मिल रहा है। खेत- खेत पराली जलाने से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंच रहा है। वायुमंडल में प्रदूषण की वजह से बेसमय आसमान में धुंओं की परत
जम जा रही है। अभी शीतलहर भी शुरू नहीं हुई है। बावजूद इसके सुबह देर तक आसमान में धुंध छाया हुआ है। जहरीली हवाएं का प्रेषण जीव- जंतुओं से लेकर मानव शरीर में भी हो रहा है। यह हाल तब है जबकि पराली जलाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा है। इसके लिए पुलिस और राजस्व टीम को निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है। मगर इसका अनुपालन अधिकांश जगहों पर नहीं हो पा रहा है।