बस्ती। मदरसा अरबिया अहले सुन्नत, मौजा परसा तकिया में हजरत अली के पैदाइश के मौके पर जश्ने ईद-ए-मिलादे मुर्तजा का आयोजन किया गया। इसमें लोगाें ने हजरत अली को याद किया। इसकी सदारत बदरूल हसन सिद्दकी और निजामत अफजल हुसैन ने किया।
इस मौके पर मोहम्मद अनवार हुसैन ने कहा कि मौलाए आलमीन हजरत अली रजीअल्लाह-अनहो की यौमे पैदाइश छह सौ ईस्वी में हुई थी। उनके पिता का नाम हजरत अलू तालिब और वालिदा का नाम हजरत फातिमा विंते असद रजीअल्लाह अनहो है। उनके बेटे इमामे हसन और इमामे हुसैन हैं। वह अल्लाह के रसूल मोहम्मद सलल्लाह अलहे वसल्लम के दामाद भी हैं। अल्लाह के रसूल ने विलायत का ताज उनके सिर पर रखकर विलायत का सिलसिला जारी किया। जो रोजे अव्वल से ताकयामत चलता रहेगा।
सदारत कर रहे बदरूल हसन सिद्दकी ने कहा कि हजरत अली इतने पाक थे कि काबे के अंदर पैदा हुए और मस्जिदे कूफा में शहादत पाई। निजामत कर रहे अफजल हुसैन ने कहा कि इनसे मोहब्बत करना ईमान की रूह है। रूह के बगैर जिस्म मुर्दा है। मौलाना अब्दुर्रब असद ने तकरीर में कहा कि हजरत अली की मोहब्बत को दिल में रखने वालों को ही दुनिया में कामयाबी मिलेगी। इस मौके पर डॉ. नूर आलम शाह, नजरूल हसन, सैदा हुसैन, रियाज अली, मोहम्मद रजा, मोहम्मद अली वारसी, सोयब रिजवी, प्रिंस, अखलाख हुसैन, नियाज हुसैन, रसूल मोहम्मद, आसिफ, शहंशाह अब्दुल कादिर आदि ने हजरत अली की याद में अपने कलाम पेश कर एक-दूसरे को मुबारकबाद दी।