बस्ती। मोहर्रम का चांद दिखने के साथ ही इमाम चौकों पर फातिहा शुरू हो गया। इमामबाड़ा में ‘या हसैन’ की सदाएं गूंजने लगीं। इसी के साथ शहर में मजलिसों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। दसवीं मोहर्रम को कर्बला के मौदान में यजीदी फौज ने पैगंबर के नवासे इमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों को तीन दिन तक भूखा-प्यासा रखने के बाद शहीद कर डाला। पैगंबर के अनुयायी इसी शहादत की याद में हर साल मोहर्रम मनाते हैं।
मंगलवार की शाम इमामबाड़ा शाबान मंजिल में मजलिस का आयोजन हुआ। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना अली हसन ने कहा कि यजीद ने इमाम हुसैन से बैयत (आत्मसमर्पण) की मांग की थी। इमाम ने अगर उसे स्वीकार कर लिया होता तो इस्लाम से हक, इंसाफ और अमन खत्म हो जाता। यजीद अपनी हर बात की शरीयत बनाना चाहता था, जो पैगंबर के नवासे को गवारा नहीं था। इमाम और उनके साथियों ने अपना खून देकर इस्लाम की हिफाजत की। उनकी इस महान कुर्बानी को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इससे पूर्व मो. रफीक और उनके साथियों ने विशेष अंदाज में सोज पढ़ा। सुहेल हैदर ने कर्बला का दर्दनाक मंजर अपने कलाम में पेश किया। मजलिस में शमसुल हसन, शम्स आबिद, शानू, जैन, अन्नू, एहसान अली, जर्रार हसैन, नजफी, अतहर, अजहर आदि मौजूद रहे।