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फोटो... छठ पूजा: अस्ताचल भुवन भाष्कर को पहला अर्घ्य आज

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अस्ताचल भुवन भाष्कर को पहला अर्घ्य आज
खरना पर सोमवार को व्रतियों ने तैयार किया प्रसाद
सरयू के नौरहनी व कुआनों के सेल्हरा घाट पर गहमागहमी
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। हे सूर्यदेव जिस तरह समूचे ब्रह्मांड में आपकी आभा-ऊर्जा विद्यमान है उसी प्रकार उनके भी पुत्र की कीर्ति दूर तक फैले। इस मन्नत के साथ सोमवार को सूर्य उपासना के महापर्व का दूसरा दिन गुजरा। लोक आस्था के इस महापर्व पर नदी घाटों पर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता रहा। जिसकी आभा में कुआनो के अमहट और कुदरहा के सेल्हरा घाट के अलावा सरयू (घाघरा) नदी के नौरहनी घाट पर आस्था का महासंगम देखा जा रहा है।
पर्यावरण वादियों की दृष्टि में मौसम की संधिकाल के दौरान प्रकृति से प्राणिमात्र के बीच समन्वय कायम करने का यह दुनिया का सबसे अनूठा अनुष्ठान है। ठसकी शुरुआत रविवार को नहाय-खाय के साथ हो चुकी है। सोमवार को खरना और मंगलवार 13 नवंबर शाम को मुख्य पर्व पर व्रती माताएं अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर छठ मैया से आशीष मांगेंगी। बुधवार 14 नवंबर सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 36 घंटे के इस निर्जला व्रत में पुत्र के दीर्घायु और यशस्वी की कामना की जाएगी। नहाय खाय में पंचमी को दिन भर व्रत रखने के बाद शाम को चूल्हे बनाकर, उसमें अक्षत, धूप, दीप व सिंदूर से पूजा की गई। प्रसाद के लिए रखे आटे की फुल्की और खीर रसियांव रोटी पका कर चौके में ही खरना किया। शहर के दक्षिण स्थित अमहट घाट और पुरानी बस्ती के निर्मली कुंड पोखरे पर भुवन-भास्कर की कृपा प्राप्त करने को आतुर अनुयायियों का हुजूम उमड़ पड़ा। कोई वेदी रंगने में मगन दिखा तो कई अपने ढंग से पूजा अनुष्ठान संपन्न करते रहे।
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अस्ताचलगामी अर्घ्य की तैयारी
इस अनुष्ठान के दौरान प्रसाद और फल से पूरी बांस की टोकरी सजाई जाती है। बांस की दो तीन बड़ी टोकरी, प्रसाद रखने के लिए बांस या पीतल के बने तीन सूप, लोटा, थाली, दूध और जल के लिए ग्लास, नए वस्त्र साड़ी, कुर्ता-पजामा के अलावा पानी वाला नारियल, पत्तेयुक्त गन्ना, सुथनी और शकरकंद, नाशपाती और बड़ा मीठा नींबू यानी टाब रखते हैं। शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी, चावल, लाल सिंदूर, धूप और एक बड़ा दीपक, हल्दी और अदरक का हरा पौधा कैराव, कपूर, कुमकुम, चन्दन, मिठाई भी अनिवार्य सामग्री है।
अर्घ्य मंत्र
ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते। अनुकंपये माम भक्त्या गृहणार्घ्यं दिवाकर:
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्रकिरणाय। मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा:
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