बरेली। गांव की युवा महिला एथलीट विपरीत परिस्थितियों और आर्थिक तंगी के बावजूद खेल जगत में अपनी पहचान बना रही हैं। ये खिलाड़ी परिवार के विरोध और संसाधनों की कमी को पीछे छोड़कर शहर में किराए के कमरों में रहकर अभ्यास कर रही हैं। अमनप्रीत और मंतशा जैसी बेटियां अपनी कड़ी मेहनत से सफलता की नई इबारत लिख रही हैं।
19 वर्षीय एथलीट अमनप्रीत (19) मूल रूप से रसूलपुर गांव की निवासी हैं। वह बरेली के संजय नगर में किराए पर कमरा लेकर एथलेटिक्स का अभ्यास करती हैं। पिछले तीन-चार साल से वह 800 मीटर इवेंट में लगातार पसीना बहा रही हैं। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर 35 स्वर्ण सहित 50 से अधिक पदक अपने नाम किए हैं। अमनप्रीत ने तीन राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया है। उनका एकमात्र सपना देश के लिए पदक जीतकर तिरंगा लहराना है। वह उत्तराखंड में होने वाली आगामी प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का जौहर दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका लक्ष्य देश के लिए पदक जीतना और तिरंगा लहराना है।
मंतशा ने बदली परिवार की सोच
रहपुरा चौधरी की एथलेटिक्स खिलाड़ी मंतशा ने विपरीत आर्थिक हालात और सामाजिक विरोध का सामना किया। उनके पिता छोटे खान पहले मजदूर थे, लेकिन शारीरिक कमजोरी के कारण उन्हें मजदूरी छोड़नी पड़ी। शुरुआत में माता-पिता और पड़ोसियों ने उनके खेल में आगे बढ़ने का विरोध किया था। स्कूल गेम्स में उनके शानदार प्रदर्शन ने परिवार की सोच बदल दी। मंतशा ने तीन राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण और रजत पदक जीते हैं। उनके भाई अब उनके संघर्ष में पूरा साथ दे रहे हैं।