दूसरा, लोधी समाज में राजनीतिक पकड़: बरेली और आसपास के क्षेत्रों में धर्मपाल सिंह को भाजपा के प्रमुख लोधी चेहरों में गिना जाता है। 2022 में उन्हें दोबारा मंत्री बनाए जाने के समय भी उनकी लगातार चुनावी जीत, संगठन से लंबे जुड़ाव और सामाजिक आधार को महत्वपूर्ण माना गया था।
तीसरा, प्रदेश की राजनीति से राष्ट्रीय भूमिका की ओर बढ़ना: पांच बार विधायक और कई सरकारों में मंत्री रहे धर्मपाल सिंह का अनुभव अब राज्यसभा के जरिये राष्ट्रीय राजनीति में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि इसे पार्टी की घोषित रणनीति के बजाय राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर संभावित कारण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
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ब्लॉक प्रमुख से मंत्री और अब राज्यसभा का टिकट
धर्मपाल सिंह का राजनीतिक सफर 1988 में मझगवां के ब्लॉक प्रमुख से शुरू हुआ। 1993 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके तीन साल बाद 1996 में आंवला से पहली बार विधायक बने।
साल 1997 में उन्हें मायावती सरकार में लोक निर्माण एवं पर्यटन राज्यमंत्री बनाया गया। इसी साल कल्याण सिंह सरकार में पंचायती राज एवं श्रम राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी मिली। 2002 में दूसरी बार विधायक बने और श्रम राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार रहे।
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साल 2007 में आंवला सीट बसपा के खाते में जाने के बाद 2012 में धर्मपाल सिंह ने फिर वापसी की। इस कार्यकाल में वह भाजपा विधानमंडल दल के उपनेता रहे। 2017 में चौथी बार विधायक बनने पर योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में सिंचाई एवं सिंचाई यांत्रिकी मंत्री बने। 2022 में पांचवीं बार जीत के बाद उन्हें योगी सरकार में फिर कैबिनेट मंत्री बनाया गया।
लोधी समाज के प्रमुख भाजपा चेहरों में शुमार
धर्मपाल सिंह की राजनीति में सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण रहे हैं। उन्हें बरेली मंडल में लोधी समाज के प्रमुख भाजपा नेताओं में माना जाता है। यही वजह है कि राज्यसभा की मौजूदा सूची में उनका चयन केवल बरेली जिले तक सीमित राजनीतिक संदेश के बजाय व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
भाजपा की घोषित सूची में ओबीसी, दलित, महिला और सामान्य वर्ग से जुड़े अलग-अलग सामाजिक आधार वाले चेहरों को जगह मिली है। धर्मपाल सिंह का चयन इसी व्यापक सामाजिक संतुलन का एक हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन को लेकर अलग-अलग सामाजिक समीकरणों को आधिकारिक कारण के रूप में नहीं बताया है।
2027 से पहले संगठन के लिए भी संदेश
उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे समय धर्मपाल सिंह जैसे लंबे समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय नेता को राज्यसभा प्रत्याशी बनाना संगठनात्मक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है।
राज्यसभा भेजे जाने की स्थिति में आंवला में पार्टी को नया चेहरा तलाशना होगा। इसके साथ ही धर्मपाल सिंह का अनुभव विधानसभा क्षेत्र तक सीमित न रहकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के काम आ सकता है। इसे 2027 की सीधी चुनावी रणनीति कहना अभी उचित नहीं होगा, लेकिन चुनाव से ठीक पहले उनका उच्च सदन के लिए चयन भाजपा के संगठनात्मक समीकरणों में बदलाव का संकेत जरूर देता है।
मंत्री पद का क्या होगा?
राज्यसभा प्रत्याशी घोषित होते ही धर्मपाल सिंह का कैबिनेट मंत्री पद समाप्त नहीं होता। अभी वह राज्यसभा चुनाव के उम्मीदवार हैं। नामांकन, चुनाव और निर्वाचन के बाद ही उनकी आगे की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट होगी।
भाजपा ने मौजूदा कैबिनेट मंत्री और पांच बार के विधायक को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया है। उनके निर्वाचित होने की स्थिति में आगे मंत्रिमंडल में बदलाव या विभागीय पुनर्व्यवस्था का फैसला पार्टी और सरकार को करना होगा।
बरेली को एक साथ दो राज्यसभा चेहरे
भाजपा ने इस बार बरेली से जुड़े दो अलग राजनीतिक चेहरों को राज्यसभा के लिए चुना है। श्रुति गंगवार की पहचान उद्यमिता, बैंकिंग और सामाजिक गतिविधियों के साथ संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत से जुड़ी है, जबकि धर्मपाल सिंह की पहचान लंबी चुनावी राजनीति, मंत्री पद और लोधी समाज के प्रमुख भाजपा चेहरे के रूप में रही है।
यानी एक ही सूची में बरेली को नई पीढ़ी की महिला और उद्यमी चेहरे के साथ लंबे जमीनी राजनीतिक अनुभव वाले नेता का प्रतिनिधित्व मिला है। रूहेलखंड की राजनीति के लिहाज से यह भाजपा के लिए दो अलग सामाजिक और राजनीतिक आधारों को उच्च सदन तक पहुंचाने वाला फैसला है।