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लॉकडाउन में छूटा काम, घरों में नहीं जगह.. कैसे जिएं

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घरों में जगह न होने के कारण गली में बैठे लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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कालीबाड़ी के दस हजार मजबूर परिवार जूझ रहे संकट के हालत से
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चौका बर्तन करने वाली महिलाओं ने की वेतन न मिलने की शिकायत

बरेली। रोज काम करके मजदूरी जुटाने वाले हजारों परिवारों के लिए लॉकडाउन मुसीबत बन गया है। घरों में झाड़ू पोंछा करने वाली महिलाओं का भी काम छिन गया और मजदूरी करने वाल उनके पतियों का भी। हालात ये हैं कि कोठरी के माफिक कमरे में छह-छह लोगों का परिवार गुजारा करने पर मजबूर है। बड़ी-बड़ी कोठियों में रहने वाले लोगों ने भी इस परेशानी के वक्त में अपने कर्मचारियों का साथ छोड़ दिया।
शहर के बीचोबीच बसे कालीबाड़ी इलाके में बरेली कॉलेज से लेकर श्यामगंज चौकी तक करीब दस हजार परिवार रहते हैं। यहां गलियों में मकानों की स्थिति यह है कि छह-छह लोगों का परिवार कोठरीनुमा कमरे में गुजारा करने पर मजबूर है। यहां अधिकतर परिवार छप्पर के नीचे ही अपना अशियाना बसाये हुए हैं। गलियों का हालत यह है कि देखकर समझ नहीं आता कि सड़क पर चल रहे हैं या सीवर पर। लोग दरवाजा खोलते हैं तो गंदगी से होकर सड़क पर आना पड़ता है।
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यहां करीब तीन हजार महिलाएं ऐसी भी हैं जो आसपास की रामपुर गार्डन, राम वाटिका, सिंधू नगर व अन्य पॉश कॉलोनियों में चौका बर्तन करके अपना परिवार चलाती है। अधिकतर पुरुष पल्लेदारी, मजदूरी या दुकानों पर काम करते हैं। मुश्किल से नौकरी पेशा लोग यहां देखने को मिलते हैं। इस लॉकडाउन के दौरान इन परिवारों कि स्थिति बहुत ही दयनीय बनी हुई है। काम का ठिकाना है और ना नहीं खाने का जुगाड़। लॉकडाउन ने इनकी व्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी है। महिला-पुरुष सब घरों में बैठकर बस मदद की उम्मीद कर रहे हैं।
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भूपराम यहां एक कोठरी नुमा कमरे में बेटी के साथ रहते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दो साल में दो जवान बेटे और पत्नी की मौत हो चुकी है। अविवाहित बेटी है जो चौका बर्तन करके परिवार चलाती है। वह भी कभी कंट्रोल तो कभी किसी दुकान पर काम करके खाना पीने का सामान जुटाते रहते हैं। ज्योति और द्रोपदी रामपुर गार्डन में एक सेठ के घर चौका बर्तन करती थी। लेकिन संक्रमण फैलने के डर से सेठ ने उन्हें घर बैठा दिया। अब उनके पास गुजारा करने को कोई साधन नहीं। उन्होंने बताया कि उन्हें महीने पर पगार भी नहीं मिली। ऐसा ही हाल कला देवी, लक्ष्मी देवी, शशि, सूरज, रामकुमार व अन्य लोगों के परिवारों का भी है।

दो जन तख्त पर सोते हैं और दो नीचे

इलाके की आबादी को देखते हुए इन परिवार के पास रहने की जगह ना के बराबर है। इलाके की विद्या ने बताया कि एक कमरे परिवार के पांच सदस्य रहते हैं। सामान्य समय में बेटे और पति अक्सर बाहर रहते थे। लेकिन अब लॉकडाउन में सब यहीं हैं। इससे रात में सोने में भी समस्या आती है। दो लोग तख्त पर सोते हैं तो दो को नीचे सोना पड़ता है। ऐसे ही इलाके के सभी बच्चे भी इलाके के ही एक मंदिर में जुटे रहते हैं। जगह न होने के चलते सड़कों पर रहना इनकी मजबूरी बन जाती है।
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