बरेली। प्रख्यात वन्य जीव विशेषज्ञ आईवीआरआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक डॉ. बीएम अरोरा के साथ कई दूसरे जानकारों का भी मानना है कि रबर फैक्टरी में जंगली जानवरों की लगातार आमद पर गहन शोध करने की जरूरत है। संभावना जताई जा रही है कि रबर फैक्टरी में बाघ और तेंदुओं का आने का कारण आनुवांशिक प्रभाव भी हो सकता है जो वन्य प्राणियों के जीन में कई पीढ़ियों तक रहता है। किसी संरक्षित वनक्षेत्र से रबर फैक्टरी के बीच बना कोई पुराना कॉरीडोर भी उनकी स्मृति में अब तक मौजूद हो सकता है।
जानकारों के मुताबिक कुछ समय पहले हाथियों का एक झुंड मानसरोवर के जंगल तक पहुंच गया था। शोध में पता चला कि जहां यह झुंड पहुंचा था, वह तमाम साल पहले हाथियों की पसंदीदा जगह थी। एक लंबे वक्त के बाद इस जंगल में हाथियों के फिर आने की वजह इस शोध में उनकी आनुवांशिक क्षमता को ही बताया गया जिसकी वजह से पीढ़ियों तक उनकी स्मृतियां कायम रहती हैं। जानकारों का कहना है कि चार सालों में रबर फैक्टरी में जानवरों की आमद बढ़ने के पीछे भी ऐसा ही कोई कारण हो सकता है। दो तेंदुए के बाद एक बाघ और अब बाघिन का आना संकेत करता है कि सालों पहले यह इलाका जंगल ही रहा होगा। जंगल तो खत्म हो गया मगर जानवरों के जीन में उस कॉरीडोर की याद नहीं मिटी जिसके जरिये वे दूसरे जंगलों से वहां आते-जाते रहे होंगे। संभवत: इसी कारण तमाम सालों बाद अब फिर वन क्षेत्रों में संख्या बढ़ने के बाद जंगली जानवर रबर फैक्टरी तक पहुंच रहे हैं। इस बारे में शोध किया जाए तो स्थिति साफ हो सकती है।
अगर कॉरीडोर नहीं है तो बरेली से
आगे क्यों नहीं जा रहे वन्य जीव
वन्य जीवों के जानकार अनिल साहनी कहते हैं कि बाघ जब किसी इलाके से गुजरता है तो इंसानों को उसकी आवाजाही की भले ही भनक न लगे लेकिन कई दूसरे जानवर खामोशी के माहौल में भी उसकी मौजूदगी भांप लेते हैं। किसी भी संरक्षित वन क्षेत्र से आने वाले बाघ और बाघिन जिस इलाके से गुजरें होंगे वहां जरूर ही इसकी आहट हुई होगी। साफ जाहिर है कि कोई न कोई ऐसा कॉरीडोर है जिसके जरिये जंगली जानवर बरेली पहुंच रहे हैं। सवाल यह है कि अगर कॉरीडोर नहीं है तो वे बरेली से आगे क्यों नहीं जा रहे हैं। इस बात की कापी संभावना है कि रबर फैक्टरी का इलाका भी पहले जंगल रहा होगा जहां बाघ-तेंदुओं के साथ तृणभोजी ऐसे जानवरों की बहुतायत होगी जिनका वे शिकार करते हैं।
बाघिन को चिड़ियाघर की कैद में नहीं, जंगल में भेजा जाए
आमतौर पर भटककर कहीं और पहुंचे बाघ जैसे वन्य प्राणियों के घायल होने पर चिड़ियाघर में छोड़ा जाता है। घायल होने से वे शिकार करने में सक्षम नहीं होते। इसी तरह उम्रदराज जानवर भी चिड़ियाघर भेजे जाते हैं। लेकिन जो बाघिन रबर फैक्टरी पहुंची है वह छह साल की युवा और पूरी तरह स्वस्थ है। पशु प्रेमियों ने मांग की है कि बाघिन को चिड़ियाघर के बजाय जंगल में छोड़ा जाए। उम्मीद भी जताई जा रही है कि देहरादून से आ रही टीम उसे पकड़कर दुधवा ले जाएगी।
पेड़ों पर बाघ के पंजों के निशान
देंगे गुम हुए कॉरीडोर का प्रमाण
आईवीआरआई के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. बीएम अरोरा के मुताबिक पीलीभीत से बाघ का बरेली आना बेहद कठिन है। अगर यह सच है कि पहले बाघ और अब बाघिन पीलीभीत अमरिया, बहेड़ी से होते हुए बरेली पहुंचे हैं तो पूरी जांच की जानी चाहिए। पहले चारों तरफ जंगल ही थे। बहुत संभव है कि कोई कॉरीडोर हो, इसको तलाश करना भी बेहद जरूरी है। कॉरीडोर अगर होगा तो उसमें मौजूद पेड़ों पर बाघ के पंजों के निशान भी जरूर होंगे। अफसरों को चाहिए कि वह इसे तलाशें। डॉ. अरोड़ा ने बताया कि ज्यादा संभावना उत्तराखंड के जंगल से बाघ के आने की है क्योंकि कई साल पहले रबर फैक्टरी में आए बाघ को ट्रेस किया गया तो पता चला कि वह दुधवा से आया था।