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करोड़ों कहां ‘खपाए’..एक स्पोर्ट्स टीम नहीं भेज पाए

Mon, 25 Sep 2017 01:37 AM IST
बरेली
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देश के खिलाड़ी क्यों ओलंपिक और बड़े खेल प्लेटफार्म पर फेल हो जाते हैं? क्यों क्वालीफाइंग राउंड में ही बाहर हो जाते हैं?  क्यों कई खेल इवेंट में टीम ही प्रतिनिधित्व नहीं कर पातीं? इसकी वजह समझने के लिए अपने देश के स्कूल, कॉलेजों और विश्वविद्यालय की खेल व्यवस्था पर नजर दौड़ाने की जरूरत भर है। आपको यह जानकर हैरत होगी कि इस स्तर पर  अधिकतर खेलों की टीमें प्रतियोगिताओं में खेलने ही नहीं भेजी जातीं। इसकी वजह है कि साल भर खेलों के नाम पर दाखिले और स्पोर्ट्स फंड पर मौज लेने के अलावा खिलाड़ी तैयार करने के बारे में कोई सोच ही नहीं है। टूर्नामेंट के समय खिलाड़ियों को स्टेडियम या क्लब से बीनकर इकट्ठा करके टीमें भेजी जाती हैं। कई बार यह ‘खेल’ भी फेल हो जाता है, जैसा वॉलीबाल और खो-खो में विश्वविद्यालय की टीम का हुआ। इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या होगी कि कई करोड़ रुपया ठिकाने लगाने वाले टूर्नामेंट जीतना तो दूर उसमें टीम भी नहीं भेज पाते। इन हालात में मोदी हों या योगी, किसी तरह का स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाकर प्रतिभाएं नहीं निखार पा रहे। इन हालात में हमारे-आपके पास बस एक ही विकल्प बचता है कि ओलंपिक या बाकी बड़ी प्रतिस्पर्धाओं के वक्त टीवी चैनल बदलकर अपने खिलाड़ियों को विदेशियों के हाथों पिटता देखने से बचते रहिए। 
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एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में वॉलीबाल के बाद खो-खो की टीम के भी निरस्त हो जाने से अब कॉलेजों में खेल सुविधाओं पर सवाल उठने लगे हैं। आखिर हर साल खेल कोटे में जमा होने वाली मोटी फीस का कॉलेज करते क्या हैं? क्या फीस जिस उद्देश्य को लेकर जमा होती है, वह पूरा होता? इसका जवाब न में ही मिलता है। हरेक छात्र से खेल की 100 रुपये फीस लेकर अपनी जेब में रखने वाले कॉलेज असल में खेलों पर तवज्जो ही नहीं देते। जो पैसा खेलों के लिए आता है वह दूसरे मदों में खर्च कर दिया जाता है। दिखावे के लिए कुछ छात्रों को किट जरूर दी जाती है। यही वजह है कि रुहेलखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध 512 कॉलेजों में से सिर्फ 15 से 20 कॉलेज ही अपनी टीमें अंतर महाविद्यालयीय खेलों में हिस्सा लेने के लिए भेजते हैं। एथलेटिक्स में जरूर 80 से 85 टीमें हिस्सा लेती हैं।
कुछ समय पहले खेल कोटे से आने वाली फीस के ऑडिट की बात उठी थी, लेकिन कॉलेजों के विरोध के बाद प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिए गया। अधिकतर कॉलेजों में तो खेल मैदान तक नहीं हैं। फिजिकल एजूकेशन के शिक्षकों पर ही खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी रहती है। कई कॉलेजों में यह शिक्षक भी नहीं हैं। जो खिलाड़ी बाहर खेलने जाते हैं, उन्हें टीए-डीए के तीन सौ रुपये विश्वविद्यालय के खाते से दिए जाते हैं। जब टीम बनने को होती है तो आनन-फानन में खिलाड़ी चुनकर टीम बना दी जाती है। उसका हश्र वॉलीबाल और खो-खो की टीम जैसा ही होता है।
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कुलपति ने कहा, ऐसे नहीं जाएगी कोई टीम 
खो-खो टीम भेजने को लेकर शनिवार को कुलपति के सामने फिर प्रस्ताव रखा गया। इस पर कुलपति ने साफ कह दिया कि अनफिट टीम किसी भी हाल में नहीं भेजी जाएगी। उसके बाद टीम जाने की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई। 

खेलों की कहानी, आंकड़ों की जुबानी
विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज: 512
एथलेटिक्स को छोड़ अन्य खेलों में हिस्सा लेने वाले कॉलेज: 15-20
एथलेटिक्स में हर साल हिस्सा लेने वाले कॉलेज: 80-85
खेल फीस: 150 रुपये। इसमें 50 रुपये विश्वविद्यालय के होते हैं। इस बार फीस 300 रुपये करने और उसमें से 100 रुपये विश्वविद्यालय को देने का प्रस्ताव पास हुआ है।
पिछले साल स्पोर्ट्स कोटे से आई फीस: करीब दो करोड़ रुपये
विश्वविद्यालय के हिस्से में आए: करीब 66.66 लाख रुपये
कॉलेजों को मिले: करीब 133.34 लाख रुपये
कॉलेजों का खेलों पर खर्च: खेल फीस का 20 से 25 फीसदी
इस बार एडमिशन हुए: करीब 1.5 लाख
फीस जमा हुई: 2.25 करोड़ रुपये

बरेली कॉलेज में खेल 
पिछले साल कुल 13.5 हजार छात्रों से 20.25 लाख फीस आई। इसमें से 6.75 लाख रुपये विश्वविद्यालय को गए। बरेली कॉलेज में सालाना खेलों पर चार से पांच लाख रुपये ही खर्च होते हैं। इसमें खेलों की व्यवस्थाएं, उपकरण, खेल मैदान का रखरखाव, कर्मचारियों का वेतन, टीम भेजने और खिलाड़ियों को किट देने के खर्च शामिल हैं। बाकी पैसा खेल फंड में रहता है।
 
विश्वविद्यालय का सालाना सालाना खेल बजट: एक करोड़
सालाना खर्च होते हैं: 40 से 45 लाख 
हर साल 52 खेलों की टीमें होती हैं तैयार 
खेल बजट का पैसा ज्यादातर प्रतियोगिताएं कराने, टीमें भेजने, शिविर आयोजित करने और प्रशिक्षकों पर खर्च होता है।


वर्जन
खेल की फीस का कॉलेज सदुपयोग कर लें तो खेलों की इतनी दुर्दशा न हो। कॉलेजों को निर्देश भी दिए गए हैं कि वे अपने स्तर से खिलाड़ियों का ठीक से प्रशिक्षण दिलाएं। दो साल पहले हमने खेल से आने वाली फीस का ऑडिट कराने का प्रस्ताव रखा था, इसे कॉलेजों ने नहीं माना। खेल मद में जो पैसा आता है, उसका सदुपयोग होना चाहिए।
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- प्रोफेसर एके जेटली, क्रीड़ा सचिव 
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