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कहां गए वो दिन

Mon, 16 Jan 2017 12:07 AM IST
बरेली
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सियासत का चेहरा बदला तो सौहार्द की दीवार भी दरकने लगी। मोहल्ले बंट गए, घर बंट गए और उस नाम का वजूद भी खत्म हो गया जिसके एक कहने भर देने से पूरे मोहल्ले के लोग आंख बंद करके एक उम्मीदवार को वोट दे दिया करते थे, जी हां, वो नाम होता था मीर मोहल्ला का। हर मोहल्ले में एक मुअज्जिज इंसान को सभी की सहमति से मीर मोहल्ला बनाया जाता था। किस पार्टी को वोट देना है यह मीर मोहल्ला ही तय करता था, केवल वोट ही नहीं बल्कि मोहल्ले के हर छोटे बड़े मसले यही मीर मोहल्ला निपटाता था और सभी उसके फैसले को मानते थे। राजनीतिक पार्टियां भी केवल मीर मोहल्ला से ही संपर्क करती थीं। मीर मोहल्लों के जरिये ही मोहल्लों में चुनावी सभाएं होती थीं। उस दौरान पूरे मोहल्ले की आवाज होता था मीर मोहल्ला और उसी के कहने पर हर धर्म के लोग अपना मत देते थे। जबसे सियासत का चेहरा बदला, वोट धर्म जाति के नाम पर मांगे जाने लगे, दिलों में नफरतें बढ़ गईं तो मोहल्लों से मीर मोहल्लों का वजूद भी खत्म हो गया। आज तो हर घर में एक मीर मोहल्ला नजर आता है।
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कुछ बुजुर्ग लोगों की बातचीत

बात 1962 की है तब मोहल्ले में एक मुअज्जिज इंसान को मीर मोहल्ला बनाया जाता था। हिंदू या मुसलमान, हर कौम के लोग इस मीर मोहल्ला की बात को मानते थे। चुनाव में तो एक जश्न का माहौल रहता था।  अब तो धर्म जाति के नाम पर सियासत होने लगी तो घर में ही कई कई मतों में लोग बंटे हुए हैं।  
-सरकार हुसैन, कोहाड़ापीर
 
मैंने पहली बार 1974 में वोटिंग की थी। तब भी मीर मोहल्ला आपसी सौहार्द की सबसे मजबूत कड़ी होती थी। पूरे मोहल्ले के वोट किस नेता को देने हैं यह मीर मोहल्ला ही तय करता था । पूरे मोहल्ले को इंसानियत के एक धागे पर पिरो कर रखता था मीर मोहल्ला।
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-कौशल अग्रवाल, आलमगिरीगंज
 
करीब 1985-90 के दशक  मीर मोहल्ला का खूब चलन रहा।  बड़े बड़े नेता तक इन मीर मोहल्लों से मिलने के लिए जाते थे। मीर मोहल्ला पूरे मोहल्ले के हितों की बात करता था। मोहल्ले के सारे मसले भी मीर मोहल्ला ही निपटाता था।  
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-राकेश कुमार गुप्ता, आलमगिरीगंज 
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